मन्नतें मॉगने लाखों श्रृद्धालु आएंगें करीला धाम

अशोकनगर । जिले की तहसील मुंगावली स्थित मां-करीला धाम में प्रतिवर्ष रंगपंचमी के अवसर पर विशाल मेला आयोजित होता है। जिसमें लाखों श्रद्धालु दूर-दूर से मां जानकी माता के दरबार में मन्नतें लेकर आते है। मेला का शुभारंभ 24 मार्च से प्रारंभ होकर 26 मार्च तक चलेगा। सबसे ज्यादा श्रृद्धालु 25 मार्च रंगपंचमी पर आएंगे। वैसे यहां हर माह की पूर्णिमा के अवसर पर भी हजारों तीर्थ यात्री मंदिर की परिक्रमा करने आते हैं। माना जाता है कि करीला में पौराणिक काल में बाल्मिकी आश्रम था तथा मां जानकी ने इसी आश्रम में लव-कुश को जन्म दिया था तथा उनका जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया गया था। करीला मंदिर के बारे में यह मान्यता प्रचलित है कि इस मंदिर में जो भी मन्नत मांगी जाए वह पूरी होती है। अपनी मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालुगण यहां राई एवं बधाई नृत्य करवाते हैं। करीला में स्थित मंदिर में मां जानकी की प्रतिमा के साथ बाल्मिकी ऋषि तथा लव व कुश की प्रतिमाएं भी स्थापित है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में बाल्मीकि आश्रम के बारे में वर्णन करते हुए लिखा है कि
नव रसाल वन विहरन सीला, सोह कि कोकिल विपिन करीला।
रहहु भवन अस्स हृदय विचारी, चंद वदनि दुख कानन भारी।।
पिछले कुछ वर्षों में इस मंदिर परिसर में नवनिर्माण कर राधाकृष्ण व रामदरबार भी स्थापित किया गया है। करीला मंदिर के पास गौशाला, धर्मशाला, जानकी तालाब, कुंआ भी स्थित है। करीला मंदिर जिला अशोकनगर से 37 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। करीला जाने के लिए कोचा तालाब होकर तथा बेलई होकर दो मार्ग बनवाए गए है। विदिशा जिले से भी आने वाले तीर्थ यात्रियों की सुविधा के लिए ग्राम बमौरीशाला होकर एक मार्ग बनवाया गया है।
करीला धाम का इतिहास:
आज से लगभग 200 वर्ष पूर्व विदिशा जिले के ग्राम दीपनाखेड़ा के महंत श्री तपसी महाराज को रात्रि में स्वप्न हुआ कि करीला ग्राम में टीले पर स्थित आश्रम में मां जानकी व लव-कुश कुछ समय रहे थे, यह बाल्मीकि आश्रम बीरान पड़ा हुआ है वहां जाकर आश्रम को जागृत करो। अगले दिन सुबह होते ही तपस्वी महाराज करीला पहाड़ी को ढूढऩे के लिए चल पड़े। जैसा उन्होंने स्वप्न में देखा व सुना था वैसे ही आश्रम उन्होंने करीला पहाड़ी पर पाया। यहां करील के पेड़ अधिक संख्या में होने के कारण इस स्थान को करीला कहा जाता है। तपसी महाराज इस पहाड़ी पर ही रुक गए तथा स्वयं ही आश्रम की साफ-सफाई में जुट गए। उन्हें देख आस-पास के ग्रामीणजनों ने भी उनका सहयोग किया। तपसी महाराज ने लगभग 40 वर्षो तक इस आश्रम में तपस्या करते हुए आश्रम की सेवा की। उनके बाद अयोध्या आश्रम से श्री बलरामदास जी महाराज करीला आए, उन्होने गोशाला स्थापित करवाई। ऐसा कहा जाता है कि आश्रम में शेर व गोमाता साथ में रहते थे। आश्रम में कई बन्दर थे जो आश्रम के कार्यो में हाथ बटांते थे। इसके बाद इस आश्रम में महेन्द्र श्री मथुरादास जी खडेसुरी रहे, जो पंजाब प्रदेश से आए थे। उन्होने भी लगभग 40 वर्षो तक आश्रम की व्यवस्था देखी। महन्त मथुरादास जी ने लगभग 12 वर्षों तक खडे रहकर तपस्या की। वे खडे होकर ही पूजा, स्नान, खाना व सोने की क्रिया कर लेते थे। उनके कार्यकाल में यहॉ की गोशाला में लगभग 200 गाय थी।
नृत्यांगनायें करती हैं राई नृत्य:
क्षेत्र में यह लोकोक्ति प्रचलित है कि लव व कुश के जन्म के बाद मॉ जानकी के अनुरोध पर महर्षि बाल्मीकि ने उनका जन्मोत्सव बडी धूम-धाम से मनाया था। जिसमें स्वर्ग से उतरकर अप्सरायें आई थी तथा उन्होने यहॉ नृत्य किया था। वही जन्मोत्सव आज भी रंग पंचमी के अवसर पर यहॉ मनाया जाता है। उसी उत्सव में हर वर्ष हजारों नृत्यांगनायें यहॉ राई नृत्य प्रस्तुत करती है।
चमत्कारी विभूति:
करीला स्थित मॉ जानकी मंदिर की विभूति को आसपास के किसान फसलों में कीटाणु नाशक व इल्लीनाशक के रूप में प्रयोग करते है। इस भभूति को फसल पर डालने से चमत्कारी ढंग से फसल से इल्लियां गायब हो जाती है। प्रति वर्ष किसान इस प्रयोग को करके लाभ उठाते है।
मेले में खरीदी हेतु दुकानें एवं मनोरंजन के लिए लगते हैं झूले:
मेले में सामग्री खरीदने के लिए बड़ी-बड़ी दुकानें एवं बच्चों के खिलौनो के अलावा सुहाग का प्रतीक सिन्दूर, नरियल, प्रसाद, राई की कैसेट, सी.डी. व डी.व्ही.डी., खाद्य सामग्री, चमड़े के बैल्ट, पत्थर की सिल व लुडिया, बर्तन आदि की हजारों दुकाने लगती है। साथ ही मनोरंजन के लिए बड़े एवं छोटे झूले लगते हैं। आने वाले श्रृद्धालू इनका भरपूर आनंद उठाते हैं। मेले में ग्वालियर, आगरा व कानपुर जैसे दूरस्थ नगरों के दुकानदार अपनी दुकाने लगाते है। करीला के रंगपंचमी मेले में ना केबल गुना व अशोकनगर जिले से बल्कि विदिशा, सागर, शिवपुरी, रायसेन, राजगढ, भोपाल, राजस्थान एवं उत्तरप्रदेश के हजारों वाहनों से लाखों तीर्थयात्रियों के आने का क्रम लगातार 24 घंण्टे जारी रहता है।
प्रशासनिक व्यवस्थाएं होती हैं चुस्त-दुरूस्त:
मेला में आने वाले सभी श्रृद्धालुओं की सुविधाओं को ध्यान मेें रखते हुए प्रशासनिक स्तर पर व्यवस्थाएं चुस्त-दुरूस्त कराई जाती हैं। कमिश्नर, आईजी सहित कलेक्टर एवं पुलिस अधीक्षक तथा जिला अधिकारियों द्वारा मेला व्यवस्थाओं पर विशेष निगरानी रखते हैं। साथ हीं यातायात व्यवस्था सुगम बनाने एवं सुरक्षा के व्यापक व्यवस्था के विशेष प्रयास किए जाते हैं। जिससे आने वाले श्रृद्धालुओं को किसी भी प्रकार की परेशानी न हो।
/मोहने/ 23 मार्च 2019

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