हट्टा की संरक्षित बावली का संकट में अस्तित्व

हट्टा की संरक्षित बावली का संकट में अस्तित्व
बालाघाट । जिले की प्राचीन धरोहरों में शामिल हट्टा की बावड़ी अब देख-रेख के अभाव में जर्जर होते जा रही है। भले ही इसे सरकार ने संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया है। लेकिन इसे सहेजने के लिए कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। जिसके कारण बावड़ी की दीवारें जर्जर होने लगी है तो यहां दीवारों पर की गई नक्काशी क्षतिग्रस्त होने लगी है। इस बावड़ी का निर्माण १७ वीं.१८ वीं शताब्दी में गोंड राजा हटे सिंह वल्के द्वारा किया गया था। जिला मुख्यालय से करीब २३ किमी की दूरी पर स्थित यह बावली अंगे्रजों के बाद यह जमींदार परिवार के अधीन थी। इसके बाद वर्ष १९८७ में इसे पुरातत्व विभाग को सौंप दिया गया था। तब से यह बावली संरक्षित स्मारक के रूप में जानी-पहजानी जा रही है। बावजूद इसके शासन द्वारा इसे सहेजने के लिए कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। मौजूदा समय में यह बावली काफी जर्जर और क्षतिग्रस्त होने लगी है। बावड़ी में जगह-जगह घास उग आई है। यहां का पानी भी दूषित होने लगा है। इतिहास एवं पुरातत्व शोध संस्थान द्वारा इसे संरक्षित करने के लिए प्रयास किए गए लेकिन राशि के अभाव में वे सफल नहीं हो पाए। जबकि इस बावली को देखने के लिए प्रतिवर्ष यहां हजारों लोग आते है।
जुमार्ने का प्रावधान
पुरातत्व विभाग ने इस बावड़ी को संरक्षित स्मारक घोषित करवाया है। विभाग की इस पहल पर शासन ने इसे संरक्षित स्मारक घोषित कर उसे क्षति पहुंचाने पर १० हजार रुपए जुर्माने नियत किया गया है। हट्टा के जमींदार परिवार के अधीन रही इस बावड़ी को सरकार ने वर्ष १९८७ में अपने आधिपत्य में लिया।
बावली की नक्काशी भी
होने लगी क्षतिग्रस्त
बावली की दीवारों में १७ वीं.१८ वीं शताब्दी के मूर्तिकारों ने पत्थरों में नक्काशी कर अनेक कलाकृतियां बनाई है। जो मौजूदा समय में देख-रेख के अभाव में क्षतिग्रस्त होने लगी है। यदि इनके क्षतिग्रस्त होने का सिलसिला ऐसे ही अनवरत रूप से जारी रहा तो कुछ समय बाद यहां की नक्काशी पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो जाएगी। उल्लेखनीय है कि बावड़ी सहित यहां के दीवारों पर की गई नक्काशीए कृलाकृतियों को देखने के लिए प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में लोग पहुंचते हैं। लेकिन शासन की लापरवाही व उदासीनता के चलते न तो यह बावड़ी संरक्षित हो पा रही है और न ही यहां की दीवारों पर की गई नक्काशी।
क्षतिग्रस्त हो रहीं बावली की दीवारें
बावली को संरक्षित किए जाने के लिए शासन द्वारा कोई राशि प्रदान नहीं की जा रही है। इतिहास एवं पुरातत्व शोध संस्थान द्वारा इसे सहेजने की दिशा में प्रयास तो किया जा रहा है। लेकिन राशि के अभाव में विभाग कुछ नहीं कर पा रहा है। जिसके कारण बावड़ी की दीवारे अब धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होकर खराब होने लगी है।
ये है इतिहास
इस बावली का निर्माण हट्टा ग्राम के प्राचीन किला में किया गया है। वंशीय राजाओं के बाद गोंड राजा हटे सिंह वल्के ने इस बावली का निर्माण किया था। माना जाता है कि हटे सिंह वल्के राजा के कारण ही इस ग्राम का नाम हट्टा पड़ा है। राजा हटे सिंह ने इसका निर्माण गर्मी के दिनों में सैनिकों के छिपने पेयजल, स्नान और आराम करने के लिए इस बावली का निर्माण किया था। जो गोंड काल के बाद मराठा शासक और भोंसले साम्राज्य में भी इसका उपयोग होते रहा। इस कारण इस बावड़ी में गोंड कालीन, मराठा शासक और भोंसले साम्राज्य की कलाकृतियां भी देखने मिलती है। बताया जाता है कि इस बावली से अंदर ही अंदर सुरंग के माध्यम से लांजी का किलाए नागपुर का किला और मंडला का किला जाने के लिए रास्ता बना हुआ है। जो फिलहाल बंद है। बावजूद इसके पुरातत्व विभाग द्वारा इसे संरक्षित किए जाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है।
१७वीं.१८वीं शदाब्दी में हुआ था निर्माण
इस बावली का निर्माण १७ वीं.१८ वी शताब्दी में बड़ी-बड़ी चट्टानों को कांट कर तराश कर व अलंकृत स्तम्भों से किया गया है। यह बावड़ी दो मंजिला है। प्रथम तल पर दस स्तंभ और उसके नीचे आठ अलंकृत स्तंभधारित बरामदे और कक्ष का निर्माण किया गया है। बावड़ी के प्रवेश द्वार पर दो चतुर्भुज शिव और १६ वीं शताब्दी की श्रीफल लिए अंबिका की प्रतिमाओं की नक्काशी की गई है।
इनका कहना है
हट्टा की बावली को संरक्षित करने के लिए अनेक बार प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा गया है। लेकिन शासन इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। इसकी देखरेख के लिए कोई राशि भी प्रदान नहीं कर रहे हैं।
विरेन्द्र सिंह गहरवार
अध्यक्ष, पुरातत्व एवं शोध संस्थान बालाघाट

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *