संक्रांति का दान

  आज से तीसरे दिन संक्रांति हैं| हमेशा की तरह इस बार भी बाऊजी ने दान देने के सामान मंगवा लिया हैं|
और सालो के बनिस्पत इस साल ठंड का कहर ज्यादा हैं| सो इस बार , बाऊजी ने घर के पास बने अनाथालय के बच्चो के लिये स्वेटर मंगवा लिया हैं| पिछली ठंड तक तो अम्मा के हाथ ही जाने कितने स्वेटर उतर जाते थे| पर इस साल उगलियों ने जवाब दे दिया हैं| फिर उमर का भी तकाजा हैं|
घर में काम करने वाली रामरती कौतूहल से ये सारा आयोजन देख रही हैं| अभी दो महीने ही हुये हैं उसे काम पर लगे| पूरानी वाली मेहरी ही टिका गई थी इसे| रामरती जरूरतमंद तो थी पर बेगैरत न थी|  उसने कभी अपने दुखड़े अम्मा के आगे नहीं परोसे| हाँ वो एक माँ भी थी|                                   इस कहर बरसाती ठंड के लिए वो तैयार न थी|
ठंड से दोहरे होते अपने बेटे को वो देख रही थी|पिछले साल पहने गरम कपड़े उतरन के थे|तन से तार तार हो रहे थे|                                 संक्रांति वाला दिन भी आया| रामरती पशोपेश में जकड़ी थी| यूँ हाथ फैलाना उसने न सीखा था|
“जाने अम्मा ने हमारे लिये भी कुछ सोचा कि नहीं| न होगा तो बेटे की खातिर ही एक स्वेटर माँग लेगी|” रामरती इस सोच में डुब-उतर रही थी|
दान के नाम का सारा सामान कार में भरा जा रहा था| तभी अम्मा ने रामरती को बुला भेजा|
” तेरे और तेरे बेटे के लिए|” कहते अम्मा ने दो स्वेटर रामरती को पकड़ा दिये| “जरूरत तो तुझे भी थी न|” रामरती निहाल हुई जा रही थी|
उधर अम्मा सोच रही थी,”जो जरूरतमंदो को मिले,असली दान तो यही हैं|”
अंजू निगम
इंदौर

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