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व्यंग्य

‘‘ बाढ़ में टीले पर बैठा आदमी’’

राष्ट्रीय आपदा है-बाढ़। पर्व के रूप में मनाते हैं लोग। हर साल जुलाई में आ जाती है। पहले तैयारी करते हैं, पर्व की तरह। राजस्थान में इस पर्व को कभी-कभार मनाया जाता है। बिहार और असम के साथ-साथ मुंबई में जोर-शोर से यह पर्व मनाया जाता है। बूढ़ी गंडक, कोसी ब्र्रह्मपुत्र आदि नदियों के कारण यह पर्व मनाया जाता है। बाढ़ की तरह ही बाढ़ से बचाव के आश्वासन भी हर साल आते हैं। आश्वासन और बाढ़ का पानी नदियों में समा जाता है। बाढ़ की खुशी में स्कूल बंद होते हैं और फिर आॅफिस।

बाढ़ का पानी सागर का आभास देता है। बाढ में जनता टीले पर और मंत्री हैलीकाॅप्टर पर नज़र आते हैं। टीले और हैलीकाॅप्टर से बाढ़ का दृश्य मनोहारी/लुभावना/लोमहर्षक दिखाई देता है। इन दृश्यों को देखकर जनता दुखी होती और खुश होते हैं-नेता, अधिकारी और कर्मचारी।

टीले से जनता मवेशियों और आदमियों को बहते हुए देखती है। उसे मत्यु-महोत्सव का आनन्द आने लगता है। गांव में मृत्यु महोत्सव बड़े जोर-शोर से मनाया जाता है। जब कोई गांव का बूढ़ा मर जाता है तो उसे गाजेबाजे के साथ श्मशान ले जाते हैं। दारू पी जाती है, लडडू खाये जाते हैं। बाढ महोत्सव में न दारू मिलती है न लड्डू। रोटी को तरस जाते हैं। बाढ़ अधिकारी और कर्मचारी दारू तथा हल्दीराम की भुजिया खाते हैं।

’’बाढ़ आपदा प्रबंधन’’ बोर्ड बाढ़ की पूर्व तैयारी करता है। चपरासी किराये की सीढ़ी पर चढ़कर बोर्ड साफ करता है। हरी मिर्ची और नीबू लगाता है। बाढ़ को नज़र न लग जाए। सोफे के कवर बदल देता है। कुर्सी पोंछ कर साफ कर देता है। उसे डर है कहीं साहब के साथ नेताजी न आ जाएं। दिवाली की तरह कार्यालय की सफाई कर दी जाती है।

कृषि मंत्री के कमरे में राहतकोष वितरण समारोह होता है। इस समारोह में कोष के लिए मगरमच्छ और बड़ी मछलियां छटपटाती दिखाई देती हैं। बाढ़ में मगरमच्छ और मछलियां नहीं बहते। बहने का अधिकार इन्सान और चैपाया को होता है। बाढ़ पर्व में दुकाने बंद हो जाती हैं। घर खुले के खुले रह जाते हैं। सबकी छुटटी हो जाती है।

ये छुटटी खुशी नहीं देती, बेचैन करने वाली होती है। इस छुटटी में स्कूल होता है, मास्टर नहीं, क्लास होती है, किताबें नहीं, इन्टरवल होता है, सरकारी दलिया नहीं। डेªस नहीं, कमर पर बाप का अंगोछा होता है। टाटपटटी नहीं, घर की गोदड़ी (कथरी) होती है। क्लास में बैठने के लिए कपड़ों और नहाने की जरूरत नहीं होती। स्कूल घर बन जाता है। स्कूली घर में डिजीटल पढ़ाई नहीं होती। स्कूल में शिक्षा और दलिया मिलता है। इस पर्व में न शिक्षा मिलती है ना ही दलिया। स्कूल घर में मास्टर की सहानुभूति नहीं होती।  भूखे भेड़ियों की जिस्मानी घूरती आंखें होती हैं।

पीने का पानी जमीन में समा जाता है। बाढ के जाते ही फसल और आपदा प्रबंधन बोर्ड का कार्यालय बरबाद हो जाते हैं। शेष रह जाते हैं अवशेष, जिन्हें देख गांव वाले खुश होते हैं। आंखों से खुशी के आंसू बहने लगते हैं। ढूंढते हैं, दो वक्त की रोटी।

बाढ़ मृत्यु महोत्सव आपदा प्रबंधन विभाग के लिए बारात में जाने जैसा होता है। त्योहार में शामिल होना किसी पिकनिक से कम नहीं है। इस पिकनिक में परिवार नहीं होता। भूखे नंगे लोग और चारों ओर पानी ही पानी होता है। चेहरे पर पिकनिक के भाव नहीं होते। भीतर उत्साह के फूल खिलते हैं। मन के बाहर मगरमच्छी आंसू होते हैं। बाढ़ से मगरमच्छ को फर्क नहीं पड़ता। मछलियां बेअसर होती हैं। पानी की गहराई में भ्रष्टाचार आकंठ डूब जाता है। बाढ़ का आपदा कार्यालय पर असर नहीं होता। कर्मचारियेां का पेट भरा और जेब भारी हो जाती है। मंत्री बनते समय हैलीकाॅप्टर में बैठने की इच्छा पूरी हो जाती है। हैलीकाॅप्टर में बैठकर ली गई सेल्फी ड्राइंग रूम में सज जाती है।

बाढ़ के चित्र अखबारों में सुर्खियां बन जाते हैं। टी वी चैनलों की फाइलों में जब्त हो जाते हैं। आने वाले साल का खर्च बच जाता है। अगले साल बाढ़ की रिपोर्ट के साथ फाइल चित्र चेप दिया जाता है। टीले पर बैठे लोगों के लिए मुआवजे की घोषणा की जाती है। वे नहीं देख पाते, टी वी पर घोषणा और घोषणा करने वाले नेता जी को।

सुनील जैन राही

एम-9810 960 285

पालम गांव- नयी दिल्ली-110045

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