काव्य ग़ज़ल

ग़ज़ल

हर रोज जिंदगी में ईक बड़ा हादसा होता है

हाकिम के फैसलों से देख नया तजुर्बा होता है

मालिक कहां गलत करता है गलती  तेरी मेरी है

होता वही यहां  मुकद्दर मे जो भी लिखा होता है

खैरात जो नहीं करता रोटी मांगना क्या उससे

नेकी गुनाह फिर नेकी सबका जायका होता है

हमको जरूरत ये रोटी की मुजरिम बना देती हैं

मेंरे नसीब हैं  हर रोज अजब फैसला होता है

राह – ए- सफ़र में  बिछड़े है दोस्त कई मेरे भी

जिधर नजर करूं दुश्मन का अब काफिला होता है

अब सीख लो सलीका तुम भी झुक के यहां चलने का

नाजुक होती है तब डाली जब फल पका होता है

अब राख-राख हो गए हैं हम चाहत नहीं कुछ”साजिद”

जिंदगी के सफर में  रोज नया  मरहला होता है

💞साजिद इक़बाल

राष्ट्रीय अध्यक्ष

जी.डी.फाउंडेशन लखनऊ,भारत

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