काव्य ग़ज़ल

ग़ज़ल

आँखों  में  सवालात  के अम्बार  उठा कर।।

वो फिर से खड़ा हो गया तलवार उठा कर।।

रोटी को  तरसता  हुआ  दो साल का बच्चा।

अब्बू  की  चला  आया है दस्तार उठा कर।।

मुफ़लिस को नहीं लेता दवाख़ाना है महंगा।

कांधे  पे वो ले  आया  है बीमार  उठा कर।।

बस्ती में लगी आग जो  हाकिम  ने न मानी।

वो हाथों  में ले  आया है  अंगार  उठा कर।।

आँगन का हो बटवारा ज़रुरत थी सभी की।

पर मिल के बहुत  रोऐ हैं दीवार  उठा कर।।

नाकाम हुई  कोशिशें  जब  अम्नो अमाँ की।

फिर भाई चला आया है  तलवार उठा कर।।  

तूफ़ान है कश्ती है समन्दर है “फ़राज़” अब।

और मैं भी चला आया हूँ पतवार उठा कर।।

     डाॅ वाहिद फ़राज़

प्रदेश संरक्षक ,झाबुआ, मध्य प्रदेश

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