साहित्य

पुस्तक समीक्षा

मन के झरोखे से जीवन की सार्थकता निहारता कविता-संग्रह ‘पानी पर लकीरें’

‘पानी पर लकीरें’ कविता-संग्रह सारिका-मुकेश का प्रथम काव्य-संकलन है। भावुक मन की संवेदनशीलता लिये यह संग्रह जीवन की अनेक स्थितियों को उजागर करता हुआ मानवीय सरोकारों और संस्कारों की प्रौढ़ता को रेखांकित करता है। इस काव्य संकलन की कविताओं में पाठक के मन मस्तिष्क को उद्वेलित करने की क्षमता है। प्रेम की शाश्वत भावना संकलन को गति प्रदान करती कवयित्री की संवेदना को व्यक्त करने का आधार प्रदान करती है, इतना कहना कोई भी अतिशयोक्ति नहीं है। विदुषी कलमकारा कहती है-‘प्रेम शाश्वत है, भले ही उसमें विछुड़ने का सच है, वह कभी मरता नहीं है, इसकी जड़े रहती हैं जिन्दा, हमारे भीतर, ताउम्र’। लेखिका के हृदय में जिन अनुभूतियों का सुगम और दुर्गम रास्ता बनने को आतुर है, उसमें किसी समय के उस फूल की स्मृतियाँ मुखरित हैं। जिसके अतीत में प्रेम और स्नेह की यादें विराज रहीं हैं। यही नहीं, उसे साथ साथ रहने के सुख का आभास भी हैं। संभवतः इसी आभास का नाम मनुष्य ने प्रीत रख दिया है।

‘पानी पर लकीरें’ सहज और सार्थक अभिव्यक्तियों का वह गुलदस्ता है जिसमें शब्द अपनी भूमिका का निर्वाह करते हैं। यहाँ पर प्रश्न उठता है कि शब्द ही चुक जाते हैं या हम खुद ही अपने चुक जाने की सीमा तक चले जाते हैं। विभिन्न प्रश्नों का उत्तर कवयित्री ने स्वयं से पूछ कर दिया है। वह स्वयं से प्रश्न करती है कि ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं। स्वयं ही इसको अभिव्यक्त करते हुए अपनी विवशता से दो-चार होती है। यद्यपि गीता, वेद, पुराण, गुरूग्रन्थ, वाईबिल या कुरान में वर्णित उसके होने की बात स्वीकार कर कह उठती है कि ‘ईश्वर है या नहीं, मैं नहीं जानती’। ‘बेटी की आवाज’ इस कविता संग्रह की लाजवाब कविता कही जा सकती है। माँ का आभार मान कर कवयित्री कहती है-‘तुम्हारा धन्यवाद माँ, मेरा गला जन्म से पूर्व गर्भ  में नहीं घोट दिया’। कवयित्री ने नारी की महत्ता को इस तरह व्यक्त किया है कि उस पर मन को चिरसन्तोष मिलता है। नारी के बिना सृष्टि के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर, संग्रह की सार्थकता पर जो मोहर लगाई है, उसे पढ़कर पाठक के मन में बेटे और बेटी के बीच के अन्तर का भेद खुल जाता है। यही कविता का सौन्दर्य है जो मानवीय संवेदनाओं को मुखरित करता है। ‘पानी पर लकीरें’ इसी प्रकार की रचनाओं का एक पल्लवित गुलदस्ता है। निजी सम्बन्धों की पवित्रता को रेखांकित करती अनेक रचनाओं को उद्धृत किया जा सकता है। जैसे ‘यही तो रहता है हर किसी का सपना’, ‘जीवन एक मॉड्रन पेंटिंग’, ‘कहीं भी हो सकती है कविता’, ‘कहने से क्या होता है’, ‘पैसे की महिमा’ और ‘परमात्मा की ओर प्रस्थान’ आदि रचनाओं का उल्लेख किया जा सकता है।

सारिका मुकेश का यह काव्य संकलन यद्यपि प्रथम संकलन है, मगर कविताओं की प्रौढ़ता से कवयित्री के वैचारिक बिन्दुओं को महत्त्वपूर्ण स्वीकार करना चाहिये। ‘संभाल कर रखना’ जैसी अत्यन्त सरल कविता में जो गंभीर तत्व सम्मुख आता है, उसका सन्दर्भ देना अनिवार्य है। देखें-‘संभाल कर रखना, मेरा बीज अपने भीतर, तुम्हारे भीतर पलेगा, बढ़ेगा, वो होगा मेरा प्रतिरूप’- किस मनोरम अभिव्यक्ति से मानवीय जिज्ञासा शान्त हो सकती है। इसी प्रकार ‘मुन्नी का ब्याह’ जैसी रचना में मनुष्य की मौलिक स्वीकृतियों के दर्शन होते हैं। पुस्तक के नामकरण के लिये लिखी कविता ‘पानी पर लकीरें’ के विषय में विचार करते समय कवयित्री सारिका ने बहुत सूक्ष्म विषय को अत्यन्त सादगी से लिखा है-‘जीवन की स्याह रातों में, पूरी-पूरी रात जाग, झोंक दिया खुद को, पूरी तरह से, और वक्त की ऑंधी मे बिखर गया सब कुछ, तिनका-तिनका होकर, और लगा ऐसे, जैसे मैं खींचती रही, पानी पर लकीरें’। जीवन पर अपने अस्तित्व को मिटा देने को पानी पर लकीरों की उपमा से विभूषित किया। ‘जब मरता है कोई रिश्ता’ और ‘सदा-सदा के लिये मुक्त’ जैसी मनःस्थितियों का वर्णन संकलन के सौन्दर्य को और भी उत्कर्ष प्रदान करती हैं। देखें एक अनसुलझें प्रश्न का सार्थक उत्तर-‘आत्मा करती है प्रतीक्षा, देह के पिंजड़े से, मुक्त होने की या फिर से नयी देह युक्त होने की’-अभिव्यक्ति की सामर्थ्य को प्रस्तुत करने को पर्याप्त है। अपने कथ्य को विस्तार से सूक्ष्म की ओर ले जाते हुए कहा जा सकता है कि ‘कविता का जन्म’, ‘कलम के घाट’, ‘धरोहर’, ‘सभ्यता का आवरण’, ‘स्मृतियों की महक’, ‘पुराना प्रेम’, ‘मैं आ गई अपने देश’, ‘हर एक सुबह’, ‘कैसे है नारी अबला’ और ‘कभी कभी मन भी बुनता है’, जैसी भावपूर्ण रचनाओं को एक गुलदस्ते की तरह बनाकर, ‘पानी पर लकीरें’ को सम्पूर्णता प्रदान की गई है। कवयित्री इसके लिये साधुवाद की पात्र है। ‘पुण्य प्रकाशन’, विवेक विहार, दिल्ली द्वारा प्रकाशित इस संकलन को मूर्धन्य व्यंग्यकार स्व. रवीन्द्रनाथ त्यागी और अपने श्वसुर स्व. बृज किशोर त्यागी को उनकी स्मृतियों के लिये समर्पित किया गया है। पूरी पुस्तक पठनीय और संग्रहणीय है।

अत्यन्त स्नेह सहित,

कृष्ण मित्र

वरिष्ठ राष्ट्रीय कवि एवं चिंतक 

गाज़ियाबाद (उ.प्र.)

पुस्तक-पानी पर लकीरें (कविता-संग्रह)

लेखक-सारिका मुकेश

प्रकाशक-पुण्य प्रकाशन, विवेक विहार, दिल्ली

मूल्य-200/

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