काव्य ग़ज़ल

प्रकाशनार्थ नज़्म

• आवाम कुछ और तरह की•

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इस शहर में चल रही है

हवा    और   तरह   की

जुर्म  हैं  और  तरह  के

और सज़ा और तरह की ..

इस   बार  चमन में  है

ख़िज़ाँ कुछ और तरह की

है  मर्ज़  और  तरह  का

और दवा  और तरह की ..

काफ़िर  तेरे  शहर  में

है मौत  और तरह की

कफ़न है और तरह का

चिता कुछ और तरह की..

आज  मेरे  शहर  की

है खबर और तरह की

इंसाफ कुछ और तरह का

फरियाद है और तरह की..

रसूलन तेरे जहान में अब

है मोहब्बत और तरह की

कैज़  है और तरह का

लैला कुछ और तरह की..

पहले तो ना थी ऐ “जैज़”

तेरे शहर की आवाम और तरह की

ओंकार और तरह का

अज़ान और तरह की..

● जयश्री सिंह 

देहरादून

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