काव्य ग़ज़ल

धारयति इति धर्म:

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ऋषि वाल्मीकि

क्रौंच-वध की व्यथा

उपजी कथा

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छोड़ो न धर्म

सारी रामायण का

यही है मर्म

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छिपा जितना

ग्रन्थों का यह कथ्य

जीतता सत्य

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पाया सौभाग्य

पार कराया तट

वाह केवट

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चखे तुमने

माँ शबरी के बेर

देर सबेर

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भूला विवेक

ख़त्म हो गया सब

बचा न एक

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क्रोध प्रचण्ड

काल गाल समाया

टूटा घमण्ड

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कर्मों का फल

ज़रूर दे ईश्वर

आज न कल

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लिखें निराला

राम की शक्ति पूजा

लिखे न दूजा

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वेदों का मर्म

यही है चिर सत्य

जीतता धर्म

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यही है रीत

अधर्म पे धर्म की

होती है जीत

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रहो प्रेम से

दूर हों सब क्लेश

यही संदेश

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ऐसा अवाम

हर तरफ़ दिखे

राम ही राम

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डा. सारिका मुकेश

      एम.ए. (अंग्रेजी), पीएच.डी. (अंग्रेजी)एसोसिएट प्रोफेसर एवं अध्यक्ष

अंग्रेजी विभागवेल्लोर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजीवेल्लोर-632 014

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