काव्य ग़ज़ल

माता से मेरी विनती

तू जगत की माता  हर साँस तू संवार दे,

मंझधार में सबकी नैया भवसागर से पार उतार दे,

हर घर- आँगन में माँ तू नूर बिखेर दे,

हर अँधेरी रात को तू उज़ली सुबह कर दे,

दे सदमति सबको धरा के कोने- कोने को तू

इतनी बहार दे,

तू जगत की माता हर साँस तू संवार दे!!

दे इतनी शक्ति हर वाणी बोले देशप्रेम की भाषा,

कामयाबी मिले सबको हर साँस की यही अभिलाषा,

सबके हृदय मासूम हसीं गुलाब सा महके,

किसी भी रूह को ना तू अहंकार दे,

तू जगत की माता हर साँस तू संवार दे!!

हर एक खुशी उसके घर-आँगन उतर आई है,

जिस -जिसने ने भी माँ तेरी महिमा गाई है,

छुपा हो जिस – जिस हृदय में बुराई का दानव,

बनकर महाशक्ति उस दानव को तू मार दे,

तू जगत की माता  हर साँस तू संवार दे!!

आभा सिंह

लखनऊ उत्तर प्रदेश

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