स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद हो जाने से गैस और फर्टिलाइजर की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित
नई दिल्ली । ईरान युद्ध का असर अब सीधे दुनिया के किसानों और खाने की कीमतों पर पड़ने लगा है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद हो जाने से गैस और फर्टिलाइजर की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिससे खेती पर बड़ा संकट खड़ा हो गया है। यह स्ट्रेट दुनिया के करीब 20फीसदी तेल के साथ-साथ लगभग एक-तिहाई फर्टिलाइजर ट्रेड के लिए अहम रास्ता है। ईरान द्वारा इस स्ट्रेट पर कड़ी पहरेदारी करने के बाद नाइट्रोजन और फॉस्फेट जैसे जरूरी पोषक तत्वों की सप्लाई रुकने लगी है। खास तौर पर यूरिया, जो फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है, उसका स्टॉक तेजी से घट रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक यह संकट ऐसे समय आया है जब दुनिया के कई हिस्सों में बुवाई का सीजन शुरू हो चुका है। वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के डिप्टी एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर ने चेतावनी दी कि अगर हालात नहीं सुधरे तो अगले सीजन में पैदावार कम हो सकती है या फसलें खराब भी हो सकती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में भी इसका असर साफ दिख रहा है। एक रिपोर्ट में पंजाब के एक किसान के हवाले से कहा गया है कि इससे छोटे किसान सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। अगर सरकार जून में बढ़ने वाली मांग के दौरान सब्सिडी नहीं देती, तो कई किसानों के लिए खेती करना मुश्किल हो जाएगा। भारत पहले से ही अपनी उर्वरक जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, और इस संकट ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक स्तर पर देखें तो करीब 30फीसदी यूरिया व्यापार इस संघर्ष की वजह से प्रभावित हुआ है। विश्लेषकों का कहना है कि गैस की कीमतें बढ़ने से यूरिया उत्पादन भी महंगा हो गया है, क्योंकि एलएनजी इसका प्रमुख कच्चा माल है। इसके अलावा, सऊदी अरब जैसे देश, जो दुनिया का बड़ा फॉस्फेट उत्पादक है, वहां से सप्लाई भी बाधित हो रही है। रिपोर्ट के मुताबिक अफ्रीका और एशिया के विकासशील देशों की स्थिति और ज्यादा नाजुक है।
इथियोपिया जैसे देश अपनी 90फीसदी नाइट्रोजन जरूरत खाड़ी देशों से पूरी करते हैं। वहीं, केन्या और जाम्बिया जैसे देशों में थोड़ी सी देरी भी फसल उत्पादन को 4फीसदी तक घटा सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है, बुवाई का समय अभी है, लेकिन फर्टिलाइज़र उपलब्ध नहीं है। यूरोप और अमेरिका में भी असर दिखने लगा है। चीन, जो दुनिया का सबसे बड़ा फर्टिलाइज़र उत्पादक है, फिलहाल घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता दे रहा है। वहीं रूस की उत्पादन क्षमता पहले से ही लगभग पूरी तरह इस्तेमाल हो रही है। ऐसे में सप्लाई गैप भरना आसान नहीं है।

