नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में साफ किया है कि पुलिस किसी भी ठोस आधार या प्रासंगिक कारण के बिना सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से किसी आरोपी के पुराने डिजिटल फुटप्रिंट्स की मांग नहीं कर सकती। यह आदेश निजता के अधिकार को मजबूत करता है और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (आईटी एक्ट) के दुरुपयोग पर अंकुश लगाता है, विशेषकर उन डिजिटल जानकारियों के संबंध में जो कथित अपराध से काफी पहले की हों। सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी गाजियाबाद पुलिस के उस आदेश को रद्द कर आई, जिसमें उन्होंने पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के एक्स अकाउंट से 1 जून से लेकर अब तक के डिजिटल फुटप्रिंट मांगे थे। उपाध्याय पर 18 अगस्त की एक रोड रेज की घटना में शामिल होने का आरोप है, इसके बाद उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि पुलिस आईटी एक्ट के प्रावधानों का गलत इस्तेमाल कर किसी व्यक्ति के निजता के अधिकार का उल्लंघन नहीं कर सकती। शीर्ष अदालत ने आनुपातिकता के सिद्धांत का पालन करने की बात कही, जिसके तहत डिजिटल फुटप्रिंट की जानकारी तभी मांगी जानी चाहिए जब अपराध से जुड़ी जानकारी जुटाने के अन्य सभी तरीके नाकाम साबित हुए हों।
पत्रकार उपाध्याय ने वरिष्ठ वकील प्रदीप राय के माध्यम से दलील दी कि 18 अगस्त की एफआईआर दरअसल उनके द्वारा 7 जून को अयोध्या राम मंदिर में दान की चोरी को लेकर प्रकाशित खोजी रिपोर्ट के स्रोतों का पता लगाने के लिए मनगढ़ंत तरीके से दर्ज हुई थी। इसके विपरीत, गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर ने अदालत को बताया कि रोड रेज मामले की जांच के तहत तीन दिनों तक तलाश करने के बाद जब उपाध्याय नहीं मिले, तब एक्स से उनके डिजिटल फुटप्रिंट की जानकारी मांगी गई थी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस के स्पष्टीकरण और डिजिटल फुटप्रिंट मांगने के आदेश को एक-दूसरे से अलग पाया। शीर्ष अदालत ने पत्रकार उपाध्याय को गिरफ्तारी से बचाने वाले अपने अंतरिम आदेश को जारी रखा, बशर्ते वह जांच में सहयोग करें। साथ ही, बेंच ने गाजियाबाद पुलिस को निर्देश दिया कि वह दो दिनों के भीतर जब्त की गई पत्रकार की गाड़ी वापस करे और चेतावनी दी कि एक्स से प्राप्त किसी भी निजी या व्यक्तिगत जानकारी का इस्तेमाल न किया जाए।

