साहिर लुधियानवी 25 अक्तूबर पुण्यतिथि पर विशेष

मनोरंजन

पल दो पल का शायर,सदियों के लिए अमर

         25अक्तूबर 1980, आज से 46 वर्ष पहले साहिर लुधियानवी इस फानी दुनिया से कूच कर गये। उर्दू शायरी और हिंदी फिल्म संगीत के चाहनेवाले साहिर लुधियानवी के फैन हैं। अब्दुल हयी जिनका मूल नाम था,ऐसे साहिर लुधियानवी हमे बेशुमार बेहतरीन नगमे,ग़ज़ल और नज़्में देकर गये। साहिर लुधियानवी जिनकी कर्मभूमि पहले लाहौर और फिर मुंबई रही। साहिर अपने पिता की ग्यारहवीं संतान थे। साहिर बहुत छोटे थे,तभी उनके पिता ने मां को तलाक दिया। इस वजह से उनका बचपन बहुत गरीबी में बीता। साहिर के मित्र पाकिस्तानी शायर अहमद राही ने  सुरिंदर देओल द्वारा लिखित जीवनी  ‘साहिर: ए लिटरेरी पोट्रेट’ में बताया कि साहिर अपनी मॉं से बेइंतहा प्यार करते थे,वहीं अपने पिता से नफ़रत करते थे। कई महिलाओं से संबंधों के कारण साहिर के पिता ने उनकी मॉं को जब तलाक दिया,तब साहिर बहुत छोटे थे। सिंगल पैरेंट के तौर पर मॉं ने उनकी परवरिश की। इसलिए मॉं से अत्यधिक प्रेम होने के कारण  शादी नहीं की। अमृता और साहिर का अफसाना हम सभी जानते है। अमृता के अलावा भी  कई महिलाएं उनके जीवन में आयी,पर साहिर के शब्दों में , वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।

        साहिर ने कॉलेज के जमाने में ही शायरी शुरू की थी। 1943 में 22 वर्ष की उम्र में तल्ख़ियां उनका पहला संग्रह प्रकाशित हुआ। पहले संग्रह ने ही साहिर को स्थापित कर दिया। उनका नाम बहुत अदब से लिया जाने लगा। उनका शुमार आला दर्जे के शायरों में होने लगा। उनकी रचनाओं में एक अलग ही अंदाज मिलता है। मजरूह सुल्तानपुरी, कैफ़ी आज़मी,राजा मेहंदी अली खॉं जैसे शायरों के रहते हुए, उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में अपना स्थान बनाया।

         1948 की  ‘आजादी की राह’ उनकी पहली फिल्म थी। यह फ़िल्म चली नहीं। साहिर को अपनी जगह बनाने के लिए मेहनत करनी पड़ी। क्योंकि साहिर समझौता कर बाजारू गीत लिखने को तैयार नहीं थे।1951 की फिल्म ‘नौजवान’ के  ‘ठंडी हवाएं लहराके गाये’ से साहिर को पहचान मिली। गुरुदत्त की फ़िल्म बाजी में  ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले’ ने साहिर की तकदीर बनाई।फ़िल्म इंडस्ट्री में उन्होंने सभी संगीतकारों के साथ काम किया। एस.डी.बर्मन, एन.दत्ता ,रोशन,खय्याम के साथ उनकी बहुत अच्छी ट्यूनिंग थी।

        साहिर के गीतों में दुनिया की वास्तविकता,जीवन का विषाद,प्रेम में भौतिकता की व्याप्ति प्रखरता से दिखती है। ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाये’, ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता’, ‘मिलती है जिंदगी में मुहब्बत कभी कभी’ ‘औरत ने जन्म दिया’, ‘ख़ुदा-ए-बर्तर तेरी ज़मीं पर ज़मीं की ख़ातिर ये जंग क्यूँ है’ जैसी रचनाएं साहिर के भीतर की आग और विषाद व्यक्त करती है।

            साहिर लुधियानवी तैयार धुनों पर गीत नहीं लिखते थे। संगीतकार उनके लिखे गीतों पर धुन बनाते थे। उनकी प्रतिभा की वजह से उन्हें संगीतकार से अधिक मानदेय मिलता था। साहिर कहते थे कि यदि गीतकार गीत नहीं लिखेगा तो संगीतकार और गायक क्या करेंगे। इस बात पर एस.डी.बर्मन से साहिर का विवाद भी हुआ। विवाद के बाद दोनों ने कभी साथ में काम नहीं किया।

         आकाशवाणी के कार्यक्रमों में गीतकार का नाम बताने का श्रेय साहिर लुधियानवी को जाता है। साहिर के संघर्ष के बाद ही आकाशवाणी ने गीतकार का नाम बताना शुरू किया।

         1950 से लेकर मृत्यु तक साहिर ने बी.आर.चोपडा के साथ काम किया। बी आर चोपड़ा के लिए उनकी अंतिम फ़िल्म इंसाफ का तराजू थी। बी.आर.चोपडा के भाई यश चोपड़ा ने निर्देशन और स्वतंत्र निर्माता के रूप में साहिर की मृत्यु तक साथ में काम किया।

          साहिर के दिल में अपने समकालीन गीतकारों के प्रति सम्मान था।1964 में ताजमहल के लिए फिल्मफेयर अवार्ड मिला,तब उन्होंने कहा कि फिल्म बंदिनी के लिए शैलेन्द्र को मिलना चाहिए था। 1977 में ‘मैं पर दो पल का शायर हूं’ के लिए दूसरी बार फिल्मफेयर मिला। 1971 में भारत सरकार ने साहिर लुधियानवी को पद्मश्री से अलंकृत किया। 

        मैं पल दो पल का शायर हूं कहने वाले साहिर लुधियानवी सदियों तक अपनी शायरी के जरिए दुनिया में बने रहेंगे।

           साहिर को जुहू कब्रिस्तान में दफ़नाया गया था।2010 में जगह की कमी के कारण उनकी कब्र को ध्वस्त कर दिया गया।

         46वी पुण्यतिथि पर शब्दों के जादूगर और अपनी मॉं के अनन्य भक्त साहिर लुधियानवी को सादर नमन।

नितिन पोल

उज्जैन