ममता सरकार द्वारा बाढ़ पीड़ितों के मुआवज़े में किए गए लूटपाट और बंदरबांट में लगभग ₹100 करोड़ का भ्रष्टाचार उजागर हुआ है। यह अमानवीय और जनता के पैसों की लूट है। इसकी जितनी निंदा की जाय, कम है।
- सीएजी की हाई कोर्ट में प्रस्तुत रिपोर्ट के तथ्य मीडिया में उजागर हुए, जिनसे स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार भ्रष्टाचार में पूरी तरह डूबी हुई है।
मालदा के हरिश्चंद्रपुर-2 में 6,985 लोगों को मुआवजा दिया गया, लेकिन एक ही खाते में दो से 42 बार राशि भेजी गई। इसके अलावा, ₹7.5 करोड़ ऐसे 1,609 पक्के मकानों के लिए दिया गया जो वास्तव में क्षतिग्रस्त नहीं थे।
ऐसे 108 लोगों को, जिनमें जनप्रतिनिधि, सरकारी कर्मचारी और टीएमसी नेता शामिल हैं, बीपीएल बाढ़ मुआवजा मिला, जबकि वे पहले से ही वेतन प्राप्त करते हैं। इसके साथ ही, ₹7 करोड़ बिना आवेदन के ही वितरित कर दिए गए।
गरीब और बाढ़ पीड़ितों के लिए निर्धारित इस धन की बेशर्मी से लूट में ममता बनर्जी की सरकार शामिल है, जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है।
आगामी विधानसभा चुनाव में बंगाल की जनता इस भ्रष्टाचार और लूट पर अपने मतों से ममता सरकार को करारा जवाब देगी।
नई दिल्ली । भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता के. के. शर्मा ने शनिवार को नई दिल्ली स्थित भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय कार्यालय में प्रेस वार्ता को संबोधित किया और पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार पर बाढ़ पीड़ितों के मुआवज़े में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने बताया कि मालदा जिले में मुआवज़ा वितरण को लेकर हाई कोर्ट के निर्देश पर सीएजी जांच हुई, जिसमें लगभग 100 करोड़ रुपये के घोटाले के तथ्य सामने आए। एक ही मकान पर कई बार भुगतान, पक्के मकानों के नाम पर फर्जी मुआवज़ा, जनप्रतिनिधियों व सरकारी कर्मचारियों को बीपीएल सहायता और बिना आवेदन के भुगतान जैसे गंभीर मामले उजागर हुए। यह अमानवीय लूट जनता और बाढ़ पीड़ितों के साथ विश्वासघात है, जिसका जवाब बंगाल की जनता आगामी विधानसभा चुनाव में देगी।
श्री शर्मा ने कहा कि आज पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार के घोटालों और भ्रष्टाचार के नए-नए कारनामे रोज़ सामने आ रहे हैं। बंगाल में एक बड़े भ्रष्टाचार का मामला सामने आया है। यह मामला पश्चिम बंगाल की ममता सरकार द्वारा बाढ़ पीड़ितों को दिए गए मुआवज़े से जुड़ा है, जो मालदा जिले के अंतर्गत किया गया था। इस संदर्भ में घोटाले को लेकर कई आवेदन हाई कोर्ट में सबमिट किए गए थे, जिसके बाद हाई कोर्ट ने सीएजी से इसकी जांच कर रिपोर्ट पेश करने को कहा। सीएजी ने जो रिपोर्ट हाई कोर्ट में रखी, उसके कुछ तथ्य समाचार पत्रों में सामने आए। इन्हीं तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार पूरी तरह से भ्रष्टाचार में डूबी हुई है। बाढ़ पीड़ितों के मुआवज़े के नाम पर ममता सरकार के अंतर्गत जिस तरह से लूट और बंदरबांट की गई, वह व्यवहारिक तौर पर भी लूट थी और अमानवीय भी, क्योंकि यह बाढ़ पीड़ितों का मुआवज़ा था। इस पूरे मामले में लगभग ₹100 करोड़ के व्यापक भ्रष्टाचार के तथ्य सामने आए हैं।
राष्ट्रीय प्रवक्ता ने कहा कि यह बेहद शर्मनाक और अत्यंत दुखद है कि बाढ़ पीड़ित, जो पहले से ही अपने मकान और सामान के नुकसान से पूरी तरह त्रस्त हैं, उन्हें मिलने वाली सरकारी सहायता में भी भ्रष्टाचार किया गया। इस भ्रष्टाचार के लगभग चार तरीके सामने आए हैं, जिनमें पहला मामला मालदा जिले के हरिश्चंद्रपुर-2 क्षेत्र से जुड़ा है। इस क्षेत्र में लगभग 6,985 लोगों को उनके मकानों के क्षतिग्रस्त होने के आधार पर मुआवजा वितरित किया गया। लेकिन यह मुआवजा जिस तरीके से दिया गया, वह चौंकाने वाला है। एक ही मकान के लिए, एक ही बैंक खाते में, दो बार से लेकर 42 बार तक मुआवजे की राशि वितरित की गई, जो इस पूरे मामले में गंभीर अनियमितताओं और भ्रष्टाचार को उजागर करता है।
श्री शर्मा ने कहा कि इस मामले में एक उदाहरण यह भी सामने आया है कि एक व्यक्ति को उसके एक ही मकान के लिए 42 बार मुआवजा दिया गया। इससे स्पष्ट होता है कि वहां मुआवजा वितरण में किस तरह का भ्रष्टाचार हुआ है। दूसरे प्रकार का मामला वह है, जिसमें लगभग ₹7.5 करोड़ की धनराशि 1,609 पक्के मकानों के क्षतिग्रस्त होने के नाम पर वितरित की गई। यह राशि उन 1,609 पक्के मकानों के क्षतिग्रस्त होने के आधार पर दी गई, जबकि उसी जिले के डीएम की रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जिले में एक भी पक्का मकान क्षतिग्रस्त नहीं हुआ। यह रिपोर्ट ममता बनर्जी की राज्य सरकार के अंतर्गत ही तैयार की गई थी, इसके बावजूद 1,609 लोगों को लगभग ₹7.5 करोड़ की राशि मुआवजे के रूप में दे दी गई। इससे यह समझा जा सकता है कि बाढ़ पीड़ितों के मुआवजे की वास्तविक जरूरतमंदों को छोड़कर किस तरह से उसकी लूट मचाई गई। तीसरे प्रकार के मामले में लगभग 108 ऐसे लोग सामने आए हैं, जिन्हें बीपीएल श्रेणी के बाढ़ पीड़ितों के मुआवजे की राशि दी गई, जबकि वे या तो जनप्रतिनिधि हैं, या सरकारी कर्मचारी हैं, या टीएमसी के स्थानीय नेता हैं। इनमें से जो जनप्रतिनिधि और सरकारी कर्मचारी हैं, वे सरकार से नियमित वेतन प्राप्त करते हैं, इसके बावजूद उन्हें भी बाढ़ पीड़ितों की राशि दी गई। चौथे प्रकार के मामले में लगभग ₹7 करोड़ की राशि ऐसे लोगों को मुआवजे के तौर पर दी गई, जिन्होंने मुआवजे के लिए आवेदन ही नहीं किया था। इन सभी तथ्यों से यह साफ समझा जा सकता है कि वर्तमान ममता बनर्जी सरकार में किस तरह के घोटाले हो रहे हैं और किस हद तक संवेदनहीनता के साथ यह सब किया जा रहा है।
राष्ट्रीय प्रवक्ता ने कहा कि यह बाढ़ पीड़ितों और गरीबों का पैसा है, जो गरीबों और पीड़ितों के लिए ही निर्धारित था। गरीबों और पीड़ितों के इस धन पर जिस तरह से असंवेदनशील तरीके से लूट मचाई गई, उसमें ममता बनर्जी की सरकार संलिप्त है, जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। यह मामला पश्चिम बंगाल हाई कोर्ट में विचाराधीन है, जहां इसकी सुनवाई होगी और लोगों को न्याय भी मिलेगा। वर्तमान समय में आगामी दिनों में वहां विधानसभा चुनाव भी होने वाले हैं और उनका मानना है कि न्यायालय के साथ-साथ आम जनता का न्याय सबसे बड़ा होता है। आम जनता इस लूट, खसोट और भ्रष्टाचार पर अपने मतों के माध्यम से अपना फैसला देगी। आने वाले विधानसभा चुनाव में जनता ममता सरकार को करारा जवाब देगी और उसे पूरी तरह पराजित करेगी।

