राग अमीर : स्वरों की साधना से आलोकित हुई अहिल्या नगरी

इंदौर

उस्ताद अमीर खां की स्मृति में सजी सुरों की महफिल; ग्वालियर और किराना घराने की गायकी ने मोहा मन ::
इंदौर । भारतीय शास्त्रीय संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मा का परमात्मा से मिलन है। इसी सांस्कृतिक चेतना को जीवंत करते हुए मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय ‘राग अमीर’ समारोह का दूसरा दिन सुरों, तालों और परंपराओं के नाम रहा। जाल सभागृह में आयोजित इस समागम में जब ग्वालियर और किराना घराने की गायकी गूंजी, तो श्रोता मंत्रमुग्ध हो उठे।
कार्यक्रम का शुभारंभ उस्ताद अमीर खां के पुत्र एवं अभिनेता शाहबाज खान, निदेशक प्रकाश सिंह ठाकुर और उप निदेशक शेखर करहाड़कर ने कलाकारों का स्वागत कर किया।
:: ग्वालियर घराने की सुरीली विरासत ::
दूसरे दिन की प्रथम सभा में पुणे की विदुषी गीतिका उमड़ेकर ने अपनी गायकी से ग्वालियर घराने की समृद्ध परंपरा को जीवंत किया। उन्होंने सांध्यकालीन राग पूर्वी में विलंबित खयाल (ताल तिलवाड़ा) की बंदिश ऐ टोनवा कर दे माई से सभा का आगाज़ किया। इसके पश्चात तीन ताल में निबद्ध मध्य लय की बंदिश काजर कारे अति सुकुमारे के माध्यम से श्रृंगार रस की छटा बिखेरी। अंत में खमाज में टप्पा गायकी ने उनकी सुदीर्घ साधना का परिचय दिया। उनके साथ अशेष उपाध्याय (तबला) और डॉ. रचना शर्मा (हारमोनियम) ने सधी हुई संगत दी।
:: तबले की थाप पर पंजाब घराने का जादू ::
अगली सभा में इंदौर के ख्यात तबला वादक हितेंद्र दीक्षित ने अपनी उंगलियों से ताल का अनूठा संसार रचा। उन्होंने पंजाब घराने की विशिष्टता के साथ तीन ताल में वादन प्रस्तुत किया। विलंबित लय में पेशकार से शुरू होकर तिस्र, चतुश्र और मिश्र जाति के रेले, कायदे और टुकड़ों ने श्रोताओं को चकित कर दिया। पुराने उस्तादों जैसे करीम बख्श और उस्ताद अल्ला रक्खां की बंदिशों को जब उन्होंने द्रुत लय में प्रस्तुत किया, तो पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। हारमोनियम पर दीपक खसरावल ने उत्कृष्ट साथ दिया।
:: आमिर खां साहब की स्मृतियों को नमन ::
तीसरी सभा में कोलकाता की विदुषी संहिता नंदी ने किराना घराने की गायकी का वैभव प्रदर्शित किया। उन्होंने राग मालकौंस में उस्ताद अमीर खां की ही अमर बंदिश जिनके मन राग बिराजे से अपनी प्रस्तुति को ऊंचाई दी। जब उन्होंने 1955 की कालजयी फिल्म झनक झनक पायल बाजे का शीर्षक गीत राग अड़ाना में सुनाया, तो श्रोताओं का हृदय झंकृत हो उठा। उनके साथ तबले पर सलीम अल्लाहवाले, हारमोनियम पर विवेक जैन और सारंगी पर आबिद हुसैन ने जुगलबंदी की।
:: ब्रज की सुगंध और आध्यात्मिक रस ::
समारोह का समापन वृंदावन के जे.एस.आर. मधुकर के गायन से हुआ। राग गोरख कल्याण की रचना गोकुल की पनिहारी से उन्होंने ब्रज की आध्यात्मिक सुगंध बिखेरी। राग दरबारी कान्हड़ा में कृष्ण और गोपियों के रास-रंग का चित्रण और अंत में सिंधु भैरवी की ठुमरी तती रो रो मैं बांट निहारा में विरह की व्याकुलता ने श्रोताओं को भावुक कर दिया।