नारी शक्ति भारत की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति

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डॉ. पंकज शुक्ला ने जमीनी सशक्तिकरण से विकसित भारत 2047 तक का रोडमैप प्रस्तुत किया
नई दिल्ली । भारत जब अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2026 की दहलीज पर खड़ा है, तब देश के आर्थिक और सामाजिक परिदृश्य में एक युगांतरकारी परिवर्तन स्पष्ट दिखाई दे रहा है। आज महिलाएं केवल विकास की लाभार्थी नहीं, बल्कि उसकी मुख्य शिल्पकार बन चुकी हैं। ₹5.01 लाख करोड़ के ऐतिहासिक जेंडर बजट, महिला श्रम भागीदारी दर (LFPR) के 60 प्रतिशत के पार पहुंचने और 10 करोड़ से अधिक महिलाओं के दुनिया के सबसे बड़े जमीनी वित्तीय नेटवर्क में संगठित होने के साथ, विकसित भारत 2047 की नींव अब पूरी तरह नारी शक्ति पर टिकी है। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में पिछले 25 वर्षों से सक्रिय विकास विशेषज्ञ और ग्राम्य के चेयरमैन डॉ. पंकज शुक्ला के अनुसार, भारत इस समय एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर है जहां केवल अवसर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि महिलाओं को वास्तविक आर्थिक स्वामित्व सौंपना अनिवार्य हो गया है।
डॉ. पंकज शुक्ला का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस उपलब्धियों के जश्न के साथ-साथ भविष्य की दिशा तय करने का भी अवसर है। भारत की लगभग आधी आबादी महिलाओं की है, इसलिए उनका सशक्तिकरण केवल एक सामाजिक सरोकार नहीं, बल्कि राष्ट्र का सबसे शक्तिशाली आर्थिक हथियार है। डॉ. शुक्ला का दृष्टिकोण राष्ट्रीय नीतियों और गांवों की धरातलीय सच्चाइयों के बीच के सेतु के रूप में उभरा है। तेलंगाना के सुदूर आदिवासी जिलों से लेकर मध्य प्रदेश के कृषि बेल्ट तक, उन्होंने देखा है कि भारत की असली विकास गाथा नीतिगत दस्तावेजों से कहीं अधिक खेतों, स्कूलों और छोटे ग्रामीण उद्यमों में काम कर रही महिलाओं के जीवन में आ रहे बदलावों से लिखी जा रही है। बजट 2026-27 में महिलाओं के लिए आवंटित ₹5.01 लाख करोड़, जो कुल बजट का 9.37 प्रतिशत है, इसी बदलती रणनीति का प्रमाण है।
आंकड़े गवाह हैं कि पिछले एक दशक में किए गए नीतिगत निवेश के परिणाम अब धरातल पर दिखने लगे हैं। Women and Men in India 2024 रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी 2017-18 के 49.8 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 60.1 प्रतिशत हो गई है, जो देश के इतिहास में सबसे तेज वृद्धि है। डॉ. शुक्ला के अनुसार, यह कोई सामान्य बदलाव नहीं है; महिलाएं अब बिना वेतन वाले घरेलू कामों से निकलकर उद्यमिता और आर्थिक नेतृत्व की ओर मजबूती से कदम बढ़ा रही हैं। विशेष रूप से ग्रामीण भारत में, जहां 76.9 प्रतिशत महिलाएं कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में लगी हुई हैं, वे खाद्य सुरक्षा की असली संरक्षक बनकर उभरी हैं।
हालांकि, इस प्रगति के बीच वित्तीय समावेशन का एक विरोधाभास भी मौजूद है। यद्यपि जन धन योजना जैसी पहलों से महिलाओं के बैंक खाते 26 प्रतिशत से बढ़कर 89 प्रतिशत हो गए हैं, लेकिन उनमें से 72 प्रतिशत महिलाएं अभी भी इन खातों का नियमित उपयोग नहीं कर पातीं। केवल 21 प्रतिशत महिलाओं की वित्तीय साक्षरता एक बड़ी चुनौती है, जिसके कारण ₹2.8 लाख करोड़ का संभावित आर्थिक अवसर अभी भी पूरी तरह से अनलॉक नहीं हो पाया है। डॉ. शुक्ला का स्पष्ट कहना है कि हमने महिलाओं को सशक्तिकरण का दरवाजा तो दे दिया है, अब उन्हें वित्तीय साक्षरता की चाबी देनी होगी, ताकि वे अपने आर्थिक भविष्य का नियंत्रण स्वयं कर सकें।
कृषि क्षेत्र में भी यही स्थिति देखने को मिलती है, जहां 64 प्रतिशत से अधिक कार्यबल महिलाएं हैं, किंतु भूमि स्वामित्व केवल 13 प्रतिशत के पास है। डॉ. शुक्ला के नेतृत्व में मिशन अन्नपूर्णा इसी विसंगति को दूर कर रहा है, जिसने 100 गांवों में महिला किसानों को आधुनिक और जैविक खेती से जोड़कर उत्पादन में 25 प्रतिशत तक की वृद्धि सुनिश्चित की है। इसी तरह नमो ड्रोन दीदी जैसी पहल ग्रामीण महिलाओं को उच्च तकनीक वाली कृषि सेवाओं के लिए तैयार कर रही है। दूसरी ओर, लखपति दीदी योजना के तहत 90.90 लाख स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से 6 करोड़ महिलाओं को सालाना ₹1 लाख से अधिक की आय तक पहुँचाने का लक्ष्य एक ग्रामीण आर्थिक क्रांति का सूत्रपात कर रहा है।
आज भारत के 39 प्रतिशत MSME महिलाओं के स्वामित्व में हैं, जिनसे 2.1 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार मिला है। स्टार्टअप की दुनिया में भी 2017 से 2024 के बीच महिला नेतृत्व वाले उद्यमों में 8 गुना वृद्धि हुई है। डिजिटल इंडिया ने इस गति को और तेज किया है, जहां 958 मिलियन इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में से 57 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों से हैं। अमेज़न सहेली जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से 1.5 लाख महिला उद्यमी सीधे शहरी बाजारों से जुड़ रही हैं। स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी, मातृ मृत्यु दर का 130 से घटकर 88 पर आना और आयुष्मान भारत के तहत 20 करोड़ से अधिक महिलाओं को स्वास्थ्य सुरक्षा मिलना एक स्वस्थ और गरिमापूर्ण जीवन की नींव रख रहा है।
खेलों के क्षेत्र में भी नारी शक्ति का परचम लहरा रहा है, जहां एशियाई खेलों और ओलंपिक क्वालीफायर में महिलाओं की भागीदारी और सफलता दर लगातार बढ़ रही है। कराटे एसोसिएशन ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष के रूप में डॉ. शुक्ला का अनुभव है कि जब एक आदिवासी लड़की मार्शल आर्ट्स सीखती है, तो वह केवल खेल नहीं, बल्कि वह अदम्य आत्मविश्वास सीखती है जो उसे नेतृत्व के लिए तैयार करता है। डॉ. शुक्ला का लक्ष्य 2047 तक महिलाओं की कार्यबल भागीदारी को 70 प्रतिशत तक ले जाना है। उनका मानना है कि जब एक महिला सशक्त होती है, तो वह केवल अपना जीवन नहीं बदलती, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र की जीडीपी की गति को दोगुना करने की क्षमता रखती है।
डॉ. पंकज शुक्ला के बारे में: डॉ. पंकज शुक्ला ग्राम्य के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर, ASRE के अध्यक्ष और कराटे एसोसिएशन ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष हैं। वे पिछले 25 वर्षों से ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में महिलाओं के सर्वांगीण सशक्तिकरण के लिए समर्पित भाव से कार्य कर रहे हैं।
ग्राम्य के बारे में: ग्राम्य एक अग्रणी ग्रामीण विकास संगठन है जो मिशन शक्ति, मिशन अन्नपूर्णा और विलेज काउंसलर नेटवर्क जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से महिलाओं के नेतृत्व, कृषि उद्यम और डिजिटल समावेशन के क्षेत्रों में जमीनी स्तर पर परिवर्तन ला रहा है।