होर्मुज की टेंशन होगी खत्म! बिना झंझट जलेंगे चूल्‍हे, सड़कों पर सरपट दौड़ेंगी गाड़ियां

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भारत ने नॉन-फॉसिल फ्यूल बेस्‍ड पावर कैपेसिटी को 60 फीसदी करने का रखा लक्ष्‍य
नई दिल्ली । ईरान जंग ने एक बार फिर से पेट्रोल, डीजल आदि बेस्‍ड डेवलपमेंट मॉडल की खामियों को उजागर कर दिया है। भारत अपनी तेल जरूरतों का तीन तिहाई आयात करता है। अरब देश एनर्जी का सबसे बड़ा स्रोत हैं। तेल के साथ ही गैस का भी आयात किया जाता है। इनसे ही भारत में गाड़ियां सड़कों पर सरपट भागती हैं और घरों में चूल्‍हे जलते हैं। ऐसे में खाड़ी देश में किसी भी तरह का संकट आने पर उसका सीधा असर भारत पर पड़ता है। अमेरिका-इजराइल द्वारा ईरान पर हमले के बाद ऐसी ही स्थिति पैदा हो गई है। एनर्जी कॉरिडोर के तौर पर अपनी पहचान रखने वाले होर्मुज स्‍ट्रेट पर भी इसका व्‍यापक असर पड़ा है। इससे तेल और गैस से लदे जहाजों की आवाजाही बुरी तरह से प्रभावित हुई है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक भारत के लिए होर्मुज जलडमरूमध्‍य काफी अहम है, क्‍योंकि इसी रूट से तेल और गैस के अधिकांश शिपमेंट आते हैं। अब इस निर्भरता को कम करने की दिशा में अहम और निर्णायक कदम उठाने का फैसला किया गया है। भारत अगले 9 से 10 साल में नॉन-फॉसिल फ्यूल बेस्‍ड पावर कैपेसिटी को कुल उत्‍पादन का 60 फीसदी करने का लक्ष्‍य रखा है। इस तरह फॉसिल फ्यूल यानी तेल आधारित ऊर्जा जरूरतों को तकरीबन एक तिहाई तक सीमित कर दिया जाएगा। ऐसे में यदि होर्मुज जैसे संकट की स्थिति में भी देश की ऊर्जा जरूरतों पर ज्‍यादा असर नहीं पड़ेगा।
भारत ने 2005 के स्तर के मुकाबले अपनी अर्थव्यवस्था की उत्सर्जन तीव्रता में 47फीसदी की कमी लाने और 2035 तक कुल बिजली क्षमता में 60फीसदी हिस्सेदारी गैर-जीवाश्म ईंधनों से हासिल करने का लक्ष्य रखा है। यह कदम पेरिस एग्रीमेंट के तहत भारत की जिम्मेदारियों का हिस्सा है और इसे देश की तीसरी एनडीसी प्रस्तुति माना जा रहा है। सरकार का कहना है कि यह लक्ष्य केवल महत्वाकांक्षी नहीं, बल्कि पहले से हासिल प्रगति पर आधारित है।
सरकार ने स्पष्ट किया कि भारत ने साल 2015 में तय किए गए अपने पूर्व एनडीसी लक्ष्यों को समय से काफी पहले ही हासिल कर लिया था। इस आधार पर अब नए और अधिक कड़े लक्ष्य तय किए गए हैं। अपडेटेड एनडीसी समानता और साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों के सिद्धांतों के अनुरूप है और ‘विकसित भारत 2047’ की व्यापक परिकल्पना को भी मजबूती देता है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और ऊर्जा आपूर्ति में अस्थिरता के बीच कई देश अपने जलवायु लक्ष्यों से पीछे हटते दिख रहे हैं। ऐसे समय में भारत का यह कदम वैश्विक मंच पर एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। ऊर्जा और जलवायु विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने इस बार जलवायु महत्वाकांक्षा और ऊर्जा सुरक्षा के बीच संतुलन साधने की कोशिश की है। दिलचस्प बात यह है कि केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के आकलनों के मुताबिक 2035-36 तक भारत की गैर-जीवाश्म क्षमता लगभग 70फीसदी तक पहुंच सकती है, लेकिन सरकार ने अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता के तौर पर 60फीसदी का ही लक्ष्य रखा है, जिससे यह लक्ष्य यथार्थवादी और विश्वसनीय बना रहे।