इन्दौर | मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय खंडपीठ इन्दौर में जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई उपरांत इसे न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए खारिज कर याचिकाकर्ता पर 5 हजार रुपए की कॉस्ट लगाई। यह बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका अपने बेटे के गायब होने और उसको ढूंढने के लिए उसके पिता ने दायर की थी परन्तु यह बात सामने आई कि बेटा एक युवती को लेकर गायब हुआ है और उसके खिलाफ एफआइआर भी दर्ज है यह बात पिता ने कोर्ट से छिपाई है। जिसकी बाद कोर्ट ने उक्त निर्णय दिया।
याचिका कहानी संक्षेप में इस प्रकार है कि जीवन ज्योति कॉलोनी देपालपुर निवासी पिता ने दायर याचिका में कोर्ट से कहा कि उनका बेटा 10 मार्च 2025 से लापता है। उसकी गुमशुदगी रिपोर्ट 6 मई 2025 को बेटमा थाने में दर्ज कराई थी लेकिन उसकी तलाश नहीं की गई है। कोर्ट ने सुनवाई करते 13 अगस्त 2026 को राज्य सरकार के वकील को मामले की स्टेटस रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए थे। जिसे पेश करते सरकारी वकील ने कोर्ट को ग्वालियर बेंच के 3 अगस्त 2026 के एक अन्य मामले का आदेश भी बताया जिसमें एक युवती 29 अप्रैल 2025 से लापता थी और उसके पिता ने भी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। इसके बाद याचिकाकर्ता ने कोर्ट से कहा कि उसको जानकारी नहीं थी कि वह युवती के साथ गया है। कोर्ट ने रिकॉर्ड और केस डायरी देखने के बाद पाया कि युवक के लापता होने की कथित तारीख के करीब दो महीने बाद गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई। जिसके बाद कोर्ट ने याचिका को न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग बता खारिज कर याचिकाकर्ता पर पांच हजार रुपए की कॉस्ट भी लगा दी।

