पुस्तक : ‘ पढ़ोगे तो हँसोगे ‘ (हास्य)
लेखक : श्री गोविंद शर्मा (संगरिया)
प्रकाशक : साहित्यागर, धामाणी मार्किट की गली, चौड़ा रास्ता, जयपुर – 302003( राज.)
संस्करण : 2025, मूल्य : 200 रुपये
समीक्षक : राजकुमार जैन राजन, आकोला

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जीवन के लिए हास्य की आवश्यकता क्यों ? इस बारे में ख्यातनाम विद्वान नामवर सिंह जी ने कहा था, ‘ साहित्य वो है जो हिलाए, डुलाए और दुलराए। ‘ हास्य ठीक यही काम करता है। हास्य उतना ही पुराना है जितना इंसान।
प्राचीन काल में पंचतंत्र, जातक कथाएं, बीरबल-अकबर के किस्से, तेनालीराम की कहानियां – ये सब चुटकुलों के ही शुरुआती रूप थे। मकसद था हंसाते-हंसाते सीख देना। हर गाँव-कस्बे में नट, भांड, विदूषक होते थे। राजा के दरबार में भी ‘राज-विदूषक’ होते थे जो हास्य- व्यंग्य से सच बोल देते थे।
आधुनिक काल में प्रिंटिंग प्रेस आने के बाद पत्र-पत्रिकाओं में ‘ हास्य-व्यंग्य’ कॉलम शुरू हुए। हरिशंकर परसाई, शरद जोशी, के.पी. सक्सेना ने हिंदी में चुटकुले-व्यंग्य को नई धार दी। आज के समय में स्टैंड-अप कॉमेडी, मीम, रील्स आदि माध्यम बदले, पर काम वही रहा – तनाव खत्म करना और सोच को बदलना, मतलब जीवन में हास्य पैदा करना। कह सकता हूँ कि चुटकुला सिर्फ मनोरंजन का साधन ही नहीं रहा, ये समाज का ‘ सेफ्टी वाल्व ‘ भी बना रहा है।
एक पुरानी कहावत है, ‘ हंसो तो सही, वरना दुनिया रुलाने के बहाने ढूंढ ही लेगी। ‘ यदि आपको ऐसी ही कोई किताब मिल जाए कि जिसमें छपी सामग्री आपको हंसाये, गुदगुदाए तो मज़ा आ जाये। ख्यातनाम साहित्यकार श्री गोविंद शर्मा जी की एक किताब आई है जिसका नाम ही ‘ पढ़ोगे तो हँसोगे ‘ है।
तन और मन के लिए हास्य जरूरी है। हंसने से दिमाग में एंडोर्फिन और डोपामिन निकलता है। ये ‘ नेचुरल पेनकिलर ‘ हैं। हास्य रिश्ते जोड़ने का काम भी करता है। साथ में हंसने वाले लोग जल्दी करीब आते हैं। झगड़े भी चुटकुलों से टल जाते हैं। बड़ी से बड़ी मुसीबत पर हंस लेना मतलब उस मुसीबत पर काबू पा लेना है। हंसता हुआ दिमाग ज्यादा आइडिया देता है, उसे क्रिएटिव बनाता है। यही सब इस किताब को पढ़कर अनुभव किया जा सकता है।
राजस्थान के संगरिया निवासी श्री गोविंद शर्मा आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। आप राजस्थान के एक मात्र ऐसे साहित्यकार है जिनको बाल कहानी संग्रह ‘काचू की टोपी’ के लिए वर्ष 2019 का केंद्रीय साहित्य अकादमी का सर्वोच्च बालसाहित्य पुरस्कार मिल चुका है। यही नहीं, आप राजस्थान साहित्य अकादमी एवं भारत सरकार के प्रकाशन विभाग से भी सम्मानित हो चुके हैं।आप बालसाहित्य, व्यंग्य व लघुकथा लेखन में पांच दशक से भी ज्यादा समय से सक्रीय हैं। आपकी लगभग 60 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें से कई पुस्तकों का अन्य भाषाओं में अनुवाद भी प्रकाशित हुआ है। राजस्थान, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र सहित देश के कई राज्यों के विद्यालयी पाठ्यपुस्तकों में आपकी रचनाएं संकलित हुई है। देश- प्रदेश की कई प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थाएं आपको सम्मानित कर चुकी हैं। आपके बालसाहित्य पर विभिन्न विश्व विद्यालयों से शोध कार्य भी सम्पादित हो रहे हैं। बालमनोविज्ञान पर आपकी बहुत अच्छी पकड़ है, जिससे वह सहज और सरल भाषा में बच्चों को आसानी से समझ आने वाली शैली में कहानियों की रचना करते हैं जिनसे बालक अपना जुड़ाव महसूस करते हैं।
इस पुस्तक के प्रकाशक श्री हिमांशु वर्मा ने पुस्तक के फ्लैप पर लिखा है, ‘ इस संग्रह में शर्मा जी द्वारा रचित सन् 1972 से अब तक रचित मौलिक चुटकुले संग्रहित है जिनमें हास्य, व्यंग्य दोनों ही है। हमारी दुनिया, घर-परिवार, दफ्तर, दुकान, सड़क राजनीति का कोई कोना गोविंद शर्मा जी की तीखी और मीठी दृष्टि से वंचित नहीं रहा है ।’
जब मेरे पास यह पुस्तक पहुंची तो एकबारगी तो विस्मय हुआ कि विभिन्न विधाओं के ख्यातनाम लेखक श्री गोविंद शर्मा जी की चुटकुलों की किताब ? और ‘ पढ़ोगे तो हँसोगे ‘ को पढ़ने के बाद चेहरे पर इनके चुटकुलों का स्मरण आते ही एक मीठी- सी मुस्कान छा जाती है। चुटुकुले भी ऐसे-वैसे नहीं हैं। हास्यरस से सराबोर करने में भी न किसी जाति, धर्म का मज़ाक बनाया है ना ही फूहड़ता का सहारा लिया है पर राजनेता व राजनीति को को भी संयत भाषा में खूब पछाड़ा है। चुटकुलों की संदीजगी इतनी कि परिवार का हर सदस्य एक दूसरे को सुनाकर हंसने – हंसाने का काम कर सकता है।
‘ पढ़ोगे तो हँसोगे ‘ में भगवान, कोरोना, लोकडाउन, भूतों पर, होली पर, मुनाफाखोरी, पब्लिसिटी, डर, अक्लमंद, नमन शीर्षकों से भी चुटकुलों को प्रकाशित किया गया है तो ‘ हम टिप्पणीबाज़ ‘ शीर्षक के तहत ऐसी टिप्पणियां दी गई है जिनसे हास्य की उत्पत्ति स्वमेव ही हो जाती है। जैसे ये टिप्पणियां देखिए-
● कुछ लोग गर्भ से महान होते हैं, कुछ कर्म से, ज्यादातर भ्रम से होते हैं।
● जल्लीकट्टू पर तो अदालत ने पाबंदी लगा दी, पर नेतागण एक- दूसरे को जली- कटी सुनाते हैं, उस पर कौन लगाएगा ?
● जिन्दा कौमें पांच साल इंतज़र नहीं करती, वे पहले ही दलबदल कर लेती हैं।
अंत में कुछ भावी विज्ञापनों का मजमून दिया गया है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि एक वरिष्ठ व नामचीन साहित्यकार द्वारा मौलिक चुटकुला पुस्तक का प्रकाशन होना इस विधा को भी मान्यता दिलवाने में सहभागी बनेगा।
तन और मन के लिए हास्य की जरूरत क्यों ? हंसने से स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल घटता है और इम्यून सेल्स बढ़ते हैं। बीमारियां कम होती हैं। हंसने से शारीरिक एक्सरसाइज हो जाती है यानि 1 मिनट ठहाका = 10 मिनट रोइंग मशीन। इससे फेंफड़े, डायाफ्राम एवं पेट की मांसपेशियां एक्टिव होती हैं। हंसने से खून की नलियां खुलती हैं, हार्ट हेल्दी रहता है। एंडोर्फिन दर्द कम करता है। इसलिए अस्पतालों में ‘ लाफ्टर थेरेपी ‘ भी होती है। यही नहीं हंसी
डिप्रेशन-एंग्जायटी को कम करती है। हास्य दिमाग को नेगेटिव लूप से बाहर निकालता है। जो इंसान मुश्किल में भी मुस्कुरा ले, वो जल्दी उबरता है। खुद पर हंस पाना सबसे बड़ी परिपक्वता है। ईगो टूटता है एवं आत्मविश्वास बढ़ता है।
बालमन के पारखी बालसाहित्यकार के लिए बालमन को आकार देने में हास्य सबसे बड़ा औजार है। डर और उपदेश से नहीं, चुटकुले से बच्चा सीखता है। शायद इसी सोच का परिणाम है- ‘ पढ़ोगे तो हँसोगे ‘ शीर्षक यह पुस्तक। हास्य साहित्य की सबसे बड़ी कसौटी यही है कि वह हंसाए भी और मर्यादा भी न छोड़े। प्रस्तुत चुटकुला-संग्रह इस कसौटी पर खरा उतरता है। यह पुस्तक दिमाग के लिए टॉनिक का काम करेगी।
आज के बाजार में जहां अधिकांश चुटकुले इंटरनेट से उठाए हुए और फूहड़ता से भरे होते हैं, वहां श्री गोविंद शर्माजी ने समकालीन समय में मौलिकता का जोखिम उठाया है। यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता है। हर चुटकुला जीवन के आसपास से लिया गया है – आम आदमी का रोजमर्रा का जीवन, उसकी उलझनें व राजनीति। इसलिए पढ़ते ही चुटुकुले अपने से लगते हैं।इनकी भाषा सरल, चुस्त और चुटीली है। कहीं भी हंसाने के लिए अश्लीलता या द्विअर्थी संवाद का सहारा नहीं लिया गया, जो लेखक के संस्कार और साहित्यिक दृष्टि का प्रमाण है। चुटकुले छोटे हैं, लेकिन उनकी चोट गहरी है। कई जगह हास्य के पीछे हल्का-सा व्यंग्य भी झांकता है जो सोचने पर मजबूर करता है। तो कुछ चुटुकुले लघुकथा का सा अहसास दिलाते हैं। इसलिए कह सकता हूँ कि दिन में कुछ समय जानबूझकर हंसिए। नए- पुराने चुटकुले पढ़िए, दोस्तों के साथ गपशप कीजिए। शरीर भी फिट रहेगा और मन भी हल्का।
यह पुस्तक परिवार के साथ बैठकर पढ़ी जा सकती है, बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सबको गुदगुदाएगी। ऐसे स्वस्थ हास्य की आज साहित्य में बहुत जरूरत है। पुस्तक हार्डबाउंड है तथा खूबसूरत कवर पेज के साथ इसकी छपाई भी सुंदर है। इस महत्वपूर्ण कृति के लिए साहित्यागार प्रकाशन व श्री गोविंद शर्मा जी को हार्दिक बधाई।
● समीक्षक-
राजकुमार जैन राजन
चित्रा प्रकाशन
आकोला- 312205 (चित्तौड़गढ़)
राजस्थान
मोबाइल: 9828219919
इमेल- rajkumarjainrajan@gamil.com

