सहमति का सिलसिला रहा जारी
नई दिल्ली । वर्ष 1991 में तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा पेश किए गए बजट ने न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था, बल्कि देश की राजनीति की दिशा भी बदल दी। 24 जुलाई 1991 को संसद में आर्थिक उदारीकरण की इस पहल ने आने वाले दशकों में भारतीय राजनीति और नीति निर्माण पर गहरा प्रभाव डाला। पी.वी. नरसिंह राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने राजनीतिक विरोध के बावजूद सुधारों को आगे बढ़ाया और आर्थिक संकट से निकलने के लिए निजीकरण, विदेशी निवेश तथा लाइसेंस राज को खत्म करने की दिशा में कदम उठाए। अगले तीन दशकों में, अलग-अलग विचारधाराओं वाली सरकारों ने आर्थिक सुधारों के मूल सिद्धांतों को जारी रखा। निजीकरण, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और लाइसेंस राज से मुक्ति धीरे-धीरे भारतीय आर्थिक नीति का अभिन्न अंग बन गए। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के अभियान में भी ‘सुधार’ प्रमुख विषय रहा, जिसे उन्होंने गहरे विश्वास से निकली प्रक्रिया बताया। राव सरकार से शुरू हुआ आर्थिक बदलाव अटल बिहारी वाजपेयी सरकार (नई दूरसंचार नीति, विनिवेश), मनमोहन सिंह सरकार (मनरेगा, सूचना का अधिकार) और नरेंद्र मोदी सरकार (वस्तु एवं सेवा कर – जीएसटी, दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता – आईबीसी) के दौर में अलग-अलग रूपों में आगे बढ़ता रहा।
हालांकि, आर्थिक सुधारों को राजनीतिक रूप से स्वीकार्य बनाना हमेशा आसान नहीं रहा। 1998 में एक सर्वेक्षण में बड़ी संख्या में लोगों ने माना कि इसका लाभ गरीबों की तुलना में अमीरों को अधिक मिला। कई बार सरकारों को मतदाताओं को सुधारों के लाभ समझाने में कठिनाई हुई और इसका चुनावी नुकसान भी उठाना पड़ा, जैसे 1996 में कांग्रेस और 2004 में वाजपेयी सरकार का ‘इंडिया शाइनिंग’ अभियान। समय के साथ राजनीतिक दलों की भाषा भी बदली। कांग्रेस के 1991 के घोषणापत्र में ‘समाजवाद’ का उल्लेख था, जो 1996 तक गायब हो गया। भाजपा ने भी आर्थिक गतिविधियों को अफसरशाही से मुक्त करने और विदेशी निवेश का स्वागत करने की बात कही। वामपंथी दलों ने भी अपने रुख में बदलाव किया, पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु सरकार ने शुरुआत में विरोध के बावजूद बाद में चुनिंदा क्षेत्रों में निवेश का स्वागत किया, जिसे बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में और बढ़ावा मिला। पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार शंकर आचार्य के अनुसार, 1996 से 1998 के राजनीतिक अस्थिरता वाले दौर में बड़े सुधार भले न हुए हों, लेकिन पहले लागू सुधारों को वापस भी नहीं लिया गया, जो आर्थिक सुधारों पर बनी व्यापक सहमति का महत्वपूर्ण संकेत था। बाद की सरकारों ने पिछली सरकारों की अधूरी पहलों को आगे बढ़ाया और उन्हें तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया। इस तरह, 1991 में शुरू हुई सुधार यात्रा सरकारों के बदलने के बावजूद जारी रही और भारतीय राजनीति में आर्थिक सुधारों को लेकर एक व्यापक सहमति का आधार तैयार हुआ।

