मां वरदायिनी की पल्ली के दर्शन के लिए देश-विदेश से पहुंचते हैं श्रद्धालु, खीजड़े की लकड़ी से बनती है नौ फीट ऊंची पल्ली; 27 स्थानों पर रुकती है धार्मिक यात्रा
गांधीनगर । गुजरात की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में रूपाल गांव की पल्ली का विशेष स्थान है। गांधीनगर के निकट स्थित रूपाल गांव में मां वरदायिनी की पल्ली हर साल शारदीय नवरात्रि की आसो सुद नोम यानी महानवमी के दिन निकाली जाती है। इस अनूठी धार्मिक परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता पल्ली पर चढ़ाया जाने वाला शुद्ध घी है। श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति, परिवार की सुख-समृद्धि और मां के प्रति आस्था व्यक्त करने के लिए पल्ली पर घी अर्पित करते हैं। पल्ली जब गांव की गलियों से गुजरती है तो कई स्थानों पर घी बहता दिखाई देता है। इसी अनूठे दृश्य को देखने के लिए गुजरात के अलावा देश के अन्य राज्यों और विदेशों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु रूपाल पहुंचते हैं।
- महाभारत काल से जुड़ी है पल्ली की मान्यता
रूपाल की पल्ली की परंपरा को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। लोककथाओं के अनुसार, पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान मां वरदायिनी की आराधना की थी। मान्यता है कि उन्होंने अपने अस्त्र-शस्त्र खीजड़े के वृक्ष के नीचे सुरक्षित रखे थे। मां के आशीर्वाद से अज्ञातवास पूरा होने और महाभारत युद्ध में विजय प्राप्त करने की कथा भी इस परंपरा से जोड़ी जाती है।
लोकमान्यता के अनुसार, युद्ध में विजय के बाद पांडवों, भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी ने मां वरदायिनी की आराधना की थी। इसी प्रसंग को पल्ली परंपरा की शुरुआत से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, ये विवरण धार्मिक आस्था और पौराणिक लोककथाओं पर आधारित हैं। इन्हें प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्यों के बजाय परंपरा से जुड़ी मान्यताओं के रूप में समझना उचित है। - घी के अभिषेक से अनोखी बन जाती हैं गांव की गलियां
रूपाल की पल्ली को देशभर के धार्मिक आयोजनों से अलग पहचान दिलाने वाला सबसे खास पहलू इस पर चढ़ाया जाने वाला शुद्ध घी है। श्रद्धालु बड़ी श्रद्धा के साथ पल्ली पर घी अर्पित करते हैं। मान्यता है कि इसके माध्यम से भक्त मां के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और परिवार के कल्याण की कामना करते हैं।
पल्ली की यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में लोग घी लेकर पहुंचते हैं। जैसे-जैसे पल्ली आगे बढ़ती है, श्रद्धालु उस पर घी चढ़ाते जाते हैं। कई स्थानों पर घी एकत्र हो जाता है और सड़कों पर बहने लगता है। घी के इस विशाल अभिषेक का दृश्य पल्ली को विशिष्ट बनाता है। हालांकि, हर साल चढ़ाए जाने वाले घी की वास्तविक मात्रा अलग-अलग हो सकती है। - खीजड़े की लकड़ी से तैयार होती है पल्ली
पल्ली तैयार करने की प्रक्रिया भी इस धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। परंपरा के अनुसार, इसे खीजड़े की लकड़ी से बनाया जाता है। पर्यटन संबंधी विवरणों में पल्ली की ऊंचाई लगभग आठ से नौ फीट बताई जाती है। इसमें पांच स्थानों पर पवित्र ज्योत रखने की परंपरा है।
नवरात्रि की महानवमी की रात जब पल्ली यात्रा पर निकलती है, तो पूरा गांव भक्तिमय वातावरण में डूब जाता है। पारंपरिक मार्ग पर इसके 27 स्थानों पर रुकने की मान्यता है। इन स्थानों पर श्रद्धालु मां के दर्शन करते हैं और घी अर्पित कर अपनी आस्था प्रकट करते हैं। मां वरदायिनी के जयकारों, भक्ति गीतों और श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच पल्ली की यात्रा आगे बढ़ती है। - आस्था के साथ गांव की एकता का प्रतीक
रूपाल की पल्ली केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गांव की सामूहिक आस्था, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक एकजुटता का भी प्रतीक है। पल्ली की तैयारी से लेकर यात्रा के आयोजन और श्रद्धालुओं की व्यवस्थाओं तक गांव के लोगों की भागीदारी महत्वपूर्ण रहती है।
पल्ली के दिन रूपाल में मेले जैसा माहौल दिखाई देता है। गांव की गलियां और चौक श्रद्धालुओं से भर जाते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा में आज भी बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं। इससे न केवल धार्मिक आस्था मजबूत होती है, बल्कि स्थानीय संस्कृति और विरासत को भी नई पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर मिलता है। - धार्मिक पर्यटन के लिए भी खास है रूपाल
रूपाल स्थित मां वरदायिनी का मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। नवरात्रि के दौरान यहां भक्तों की आवाजाही बढ़ जाती है, जबकि आसो सुद नोम को निकलने वाली पल्ली के कारण गांव में विशेष रौनक रहती है।
पांडवों से जुड़ी पौराणिक मान्यता, खीजड़े की लकड़ी से बनी पल्ली, पांच पवित्र ज्योत और शुद्ध घी के अभिषेक की परंपरा इस आयोजन को गुजरात की विशिष्ट धार्मिक विरासत बनाती है। हर साल उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ रूपाल को धार्मिक पर्यटन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण बनाती है।
रूपाल की पल्ली गुजरात की उस जीवंत परंपरा का प्रतीक है, जिसमें आस्था, लोकविश्वास, सामूहिक सहभागिता और सांस्कृतिक विरासत एक साथ दिखाई देते हैं। मां वरदायिनी के जयकारों और घी के अभिषेक के बीच निकलने वाली यह पल्ली आज भी लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी हुई है।

