ओंकारेश्वर में रामकथा के दौरान मंदिरों में बलि प्रथा पर जताई चिंता, आदि शंकराचार्य की गुरु-शिष्य परंपरा को किया याद

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ओंकारेश्वर/इंदौर । नवरात्र शक्ति की आराधना का पर्व है और शक्ति उपासना में समस्त जीवों के प्रति करुणा एवं श्रद्धा का भाव होना चाहिए। देश के कई हिस्सों और मंदिरों में अब भी पशुबलि की परंपरा जारी रहना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह बात सुप्रसिद्ध कथावाचक मोरारी बापू ने भारत स्वस्तिक यात्रा के अंतर्गत ओंकारेश्वर में आयोजित रामकथा के दौरान कही। उन्होंने पशुबलि प्रथा बंद करने की अपील करते हुए कहा कि सच्ची आध्यात्मिकता करुणा, प्रेम और अहंकार से मुक्ति में निहित है।
मोरारी बापू ने कथा के दौरान अभिमान के विभिन्न रूपों की चर्चा करते हुए निरभिमान को श्रेष्ठ अवस्था बताया। उन्होंने कहा कि ज्ञान, योग्यता या संपत्ति के कारण अहंकार करना उचित नहीं है। सच्ची महानता विनम्रता में निहित है। व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके आचरण और स्वभाव से होती है।
:: आदि शंकराचार्य की आध्यात्मिक यात्रा से जुड़ी है ओंकारेश्वर की भूमि ::
भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल ओंकारेश्वर का संबंध आदि शंकराचार्य और उनके गुरु गोविंद भगवत्पाद की परंपरा से भी जुड़ा है। परंपरागत मान्यता के अनुसार, बाल्यावस्था में आदि शंकराचार्य की भेंट नर्मदा तट पर स्थित एक गुफा में गुरु गोविंद भगवत्पाद से हुई थी, जहां उन्होंने आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त की। मोरारी बापू ने इस प्रसंग का उल्लेख करते हुए ओंकारेश्वर की आध्यात्मिक महत्ता और गुरु-शिष्य परंपरा को याद किया। उन्होंने ओंकार को आदि नाद का प्रतीक बताते हुए स्वस्तिक से उसके संबंध का भी उल्लेख किया।
भारत स्वस्तिक यात्रा का आयोजन मोरारी बापू के मार्गदर्शन में संतकृपा सनातन संस्थान की ओर से किया जा रहा है। मिराज समूह के चेयरमैन एवं संस्थान के प्रबंध न्यासी मदन पालीवाल ने कहा कि ओंकारेश्वर भगवान शिव की उपासना और आदि शंकराचार्य की आध्यात्मिक विरासत, दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। यात्रा के माध्यम से भारत की आध्यात्मिक परंपराओं और उनके शाश्वत मूल्यों को सामने लाने का प्रयास किया जा रहा है।
लगभग 9,000 किलोमीटर लंबी इस यात्रा में करीब 900 श्रद्धालु मोरारी बापू के साथ दो विशेष ट्रेनों – 22 कोच वाली कैलाश भारत गौरव और 16 कोच वाली चित्रकूट भारत गौरव से यात्रा कर रहे हैं। यात्रा के पहले चरण का शुभारंभ 10 अक्टूबर को कन्याकुमारी से हुआ और समापन 23 अक्टूबर को केदारनाथ में प्रस्तावित है। यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर रामकथा के साथ भंडारे का आयोजन भी किया जा रहा है, जिसमें श्रद्धालुओं को निःशुल्क शाकाहारी भोजन प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।