उमड़ घुमड़ कर बादल बरसे,
बिजली तड़की सारी रात ।
सांय सांय कर चली हवाएं,
बैचेन रहा दिल सारी रात।।
चारो और सिसके सन्नाटा,
अँधेरा चीखा सारी रात ।
जंगल सागर सभी दिशाएं,
फूट फूट रोये सारी रात ।।
पलकें थम गई दिल तड़पा है,
मुझे नींद न आई सारी रात।
भय से सशंकित वृक्ष सभी,
थर थर कांपे सारी रात।।
असीम जलस्त्रोत ले असंख्य बादल,
नापते रहे धरा, सारी रात।
सागर नदिया,वनपथ-जनपथ ने,
रात की चादर ओढ़ी सारी रात।।
हृदय में उठती सभी को सिहरन,
भय ने पाँव पसारे सारी रात।
डरा रही है सृष्टि सबको,
नदिया सोई ना सारी रात।।
घोंसले मैं डरे छिपे से विकल पक्षियों की,
आँख न लागी सारी रात ।
खोह कंदराओं में प्राण बचाए,
वन पशु भी जागे सारी रात।।
‘ पीव’ घरों में कुछ जागे, कुछ सोये थे,
और अँधेरा चीखा सारी रात।
नभ और धरा पर उतरा तम था,
तम का राज्य रहा सारी रात ।।
आत्माराम यादव, पीव वरिष्ठ पत्रकार
श्रीजगन्नाथधाम, काली मंदिर के पीछे,
ग्वालटोली, नर्मदापुरम मध्यप्रदेश मो 9993376616