सुन लाडली मेरी,

तुझे जीवन का पाठ पढ़ाते है।

लक्ष्मी नहीं……….सीता नहीं 

तुझे चंडी रुप में हम बुलाते है ..!

घर घर में अलख जगाना है।

तुझे चंडी….

कोई नहीं है राम यहां 

तुम्हें स्वयं रावण को सबक सिखाना है।

तुझे चंडी…..

छू ले जो दामन तेरा

उस राक्षस का अस्तित्व धरा से मिटाना है।

तुझे चंडी….

कर ना सके नर कोई अपमान फिर किसी नारी का

तुम्हें ऐसा साम्राज्य बनाना है।

तुझे चंडी रूप में आना है……!

इस धरा को पाप मुक्त कर दिखाना है ।

तुझे चंडी रूप में आना है…..

सदियों से चली आ रही इस अन्याय पे 

अब अंकुश तुम्हें लगाना है ।

तुझे चंडी रूप में आना है….!

वक्त नहीं है ये लाज शरम का 

नर पिशाचों को अब शक्ति का भान कराना है।

तुझे चंडी रूप में आना है…!

संयम का बांध टूट चुका अब और नहीं

इस पाप अग्नि को यही बुझाना है।

तुझे चंडी…!

किरण काजल( बेंगलुरु)