घरों में बची एक्सपायर दवाएं, अस्पतालों का मेडिकल वेस्ट से बढ़ रहा एएमआर का खतरा!

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-विशेषज्ञ बोले- इसके तात्कालिक दुष्प्रभाव भले न दिखें, इसके दूरगामी परिणाम बेहद गंभीर
रांची । एंटीबायोटिक दवाओं के इस्तेमाल को अक्सर एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) की मुख्य वजह माना जाता है, लेकिन इसके पीछे एक और बड़ा और कम दिखने वाला खतरा तेजी से उभर रहा है मेडिकल कचरे का गलत निपटारा। घरों में बची या एक्सपायर हो चुकी एंटीबायोटिक्स, अस्पतालों से निकलने वाला मेडिकल वेस्ट और दवा फैक्ट्रियों से बिना शोधित बहता दवा मिश्रित पानी एएमआर को बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहा है। मीडिया रिपोर्ट में विशेषज्ञों के मुताबिक यह कचरा मिट्टी, पानी और हवा के जरिए इंसानी शरीर तक पहुंचता है। परिणामस्वरूप बैक्टीरिया दवाओं के प्रति प्रतिरोधी बनते जाते हैं और सामान्य संक्रमण भी जानलेवा साबित होने लगते हैं। शहर के ज्यादातर घरों में पुरानी और एक्सपायर दवाएं सालों तक रखी रहती हैं। जरूरत न होने पर इन्हें कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है या नालियों में बहा दिया जाता है। इससे एंटीबायोटिक के अंश पानी और मिट्टी में मिल जाते हैं। यही अंश बैक्टीरिया को दवाओं के प्रति प्रतिरोधी बनने का प्रशिक्षण देते हैं।
रिम्स के सेवानिवृत्त एक डॉक्टर ने बताया कि लोग सोचते हैं कि एक-दो गोली फेंक देने से क्या फर्क पड़ेगा, लेकिन यही छोटी-छोटी लापरवाहियां एएमआर को जन्म देती हैं। एंटीबायोटिक का अंश जब लंबे समय तक पर्यावरण में रहता है, तो बैक्टीरिया धीरे-धीरे उसे झेलना सीख लेते हैं। सरकारी और निजी अस्पतालों में मेडिकल वेस्ट निस्तारण के लिए नियम और एसओपी तो बने हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति चिंताजनक है।
सरकारी अस्पतालों में कचरा निस्तारण नीति पूरी तरह मजबूत नहीं हो पाई है। कई जगहों पर इस्तेमाल की गई सीरिंग, पट्टियां, दवाओं की शीशियां और अन्य जैव-चिकित्सीय कचरा खुले में पड़ा रहता है। रांची स्थित रिम्स में मेडिकल वेस्ट निस्तारण की व्यवस्था मौजूद है, लेकिन कार्यप्रणाली में खामियों के कारण समस्या बनी हुई है। अस्पताल परिसर के पीछे बनाए गए कचरा स्टोरेज में मेडिकल कचरा बिखरा पड़ा रहता है। कई बार कचरे को वहीं जलाया जाता है या आसपास फेंक दिया जाता है। हाथ से कचरा उठाकर निस्तारण के लिए ले जाने की प्रक्रिया में भी पूर्ण स्वच्छता और सुरक्षा का पालन नहीं हो पाता। इससे आसपास के इलाकों में रहने वाले लोग और हास्टल में रह रहे छात्र-छात्राएं दुर्गंध और प्रदूषण से परेशान हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके तात्कालिक दुष्प्रभाव भले स्पष्ट न दिखें, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं। स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब मेडिकल वेस्ट सामान्य कचरे में मिल जाता है। रिम्स परिसर में कई जगह सामान्य कचरे के ढेर में भी मेडिकल वेस्ट मिला पाया जाता है। कचरा समय पर नहीं उठता और बड़े डस्टबीन के आसपास साफ-सफाई का अभाव रहता है। इससे न केवल संक्रमण का खतरा बढ़ता है, बल्कि एएमआर की प्रक्रिया भी तेज होती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक मेडिकल कचरे से फैलने वाला एएमआर आने वाले सालों में बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन सकता है। ऐसी स्थिति में सामान्य संक्रमण के इलाज में भी महंगी और सीमित दवाओं का सहारा लेना पड़ेगा। डॉक्टर बताते हैं कि एएमआर कोई भविष्य की समस्या नहीं, बल्कि वर्तमान का संकट है। अगर मेडिकल वेस्ट और एक्सपायर एंटीबायोटिक्स के निस्तारण पर अभी सख्ती नहीं की गई, तो आने वाली पीढ़ी के लिए साधारण इलाज भी मुश्किल हो जाएगा।