धुलेट की पपीता दीदी ने नरवाई को बनाया कमाई का जरिया

मध्य प्रदेश

:: आजीविका मिशन से बदली किस्मत; स्ट्रा-रीपर मशीन चलाकर बनीं आत्मनिर्भर, पशुपालकों को भी मिली राहत ::
इंदौर । ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत इंदौर जिले की महिलाएं अब न केवल आत्मनिर्भर हो रही हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी मिसाल पेश कर रही हैं। जिले के ग्राम धुलेट में द्वारिकाधीश आजीविका स्व-सहायता समूह की सदस्य पपीता रावत ने स्ट्रा-रीपर (पराली से भूसा बनाने वाली मशीन) का सफल संचालन कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नई इबारत लिखी है। जिस नरवाई (पराली) को किसान खेतों में बेकार समझकर जला देते थे, पपीता दीदी ने उसे अपनी मेहनत से कंचन (कीमती भूसे) में बदल दिया है।
पपीता रावत ने समूह के माध्यम से 2 लाख 50 हजार रुपये का ऋण लेकर आधुनिक स्ट्रा-रीपर मशीन खरीदी। गेहूं की कटाई के बाद खेतों में बचे अवशेषों को इस मशीन के जरिए बारीक काटकर मवेशियों के लिए पौष्टिक भूसे में तब्दील किया गया। पपीता दीदी की मेहनत का सुखद परिणाम यह रहा कि अब तक इस मशीन से करीब 150 ट्रॉली भूसा तैयार किया जा चुका है, जिससे समूह को लगभग 3 लाख 50 हजार रुपये की शुद्ध आय प्राप्त हुई है। यह उपलब्धि ग्रामीण महिलाओं की तकनीकी क्षमता और कठिन परिश्रम का जीवंत प्रमाण बनकर उभरी है।
इस नवाचार से ग्रामीण क्षेत्र में तीन बड़े सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। पहला पर्यावरण का बचाव, क्योंकि पहले किसान अगली फसल की तैयारी के लिए खेतों में आग लगा देते थे, जिससे प्रदूषण फैलता था और जमीन की उपजाऊ शक्ति भी नष्ट होती थी। अब मशीन के उपयोग से नरवाई जलाने की समस्या पर लगाम लगी है। दूसरा फायदा सस्ता चारा मिलना है; अब गांव में ही पशुधन के लिए भूसा आसानी से उपलब्ध होने लगा है, जिससे स्थानीय पशुपालकों की लागत कम हुई है। तीसरा सबसे बड़ा लाभ महिला सशक्तिकरण है, जहाँ पपीता दीदी द्वारा भारी मशीनरी का सफल संचालन गांव की अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गया है।
द्वारिकाधीश स्व-सहायता समूह का यह प्रयास ग्रामीण क्षेत्र में सामाजिक और पर्यावरणीय परिवर्तन का उत्कृष्ट उदाहरण है। पपीता रावत का कहना है कि आजीविका मिशन से जुड़ने के बाद मेरा आत्मविश्वास बढ़ा है। अब मैं न केवल अपने परिवार का आर्थिक सहयोग कर रही हूँ, बल्कि गांव को प्रदूषण मुक्त रखने में भी मदद कर रही हूँ। प्रशासन का यह मिशन अब धुलेट जैसे कई गांवों में स्वरोजगार के नए द्वार खोल रहा है, जिससे खेती और किसानी दोनों को मजबूती मिल रही है। गौरतलब है कि पराली प्रबंधन का यह धुलेट मॉडल जिले के उन क्षेत्रों के लिए नजीर है, जहाँ नरवाई जलाना आज भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।