सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री के फैसले पर सरकार बोली – अदालत धार्मिक मामलों में न दें दखल

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नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने मंगलवार को केरलम के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को एंट्री देने का आदेश जारी रहे या नहीं इस पर पहले दिन की सुनवाई की। केंद्र ने कहा- सबरीमाला मामले में गलत फैसला दिया गया था। उसे गलत कानून घोषित किया जाना चाहिए। मासिक धर्म आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक बरकरार रखी जाए। धार्मिक आस्था के मामले में अदालत को दखल नहीं करना चाहिए।
सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा इस मामले में अनुच्छेद 17 दलील पर किस तरह पेश किया जाए, यह मेरी समझ से बाहर है। एक महिला होने के नाते मैं यह कहना चाहूंगी कि ऐसा नहीं हो सकता कि हर महीने 3 दिन तक तो महिला को अछूत माना जाए और चौथे दिन अचानक कोई अछूतपन न रह जाए।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर कोई सामाजिक बुराई है, जिसे धार्मिक प्रथा का नाम दे दिया गया हो तो अदालत उनके बीच फर्क कर सकती है कि वह एक सामाजिक बुराई है या कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा है। इस पर केंद्र ने कहा कि संवैधानिक दृष्टि से इसका जवाब यह होगा कि इसका समाधान अनुच्छेद 25(2)(बी) में है, यानी संसद इस पर कानून बना सकती है।
दरअसल, धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव के मुद्दे पर जारी इस सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट सबरीमाला के अलावा मस्जिदों में महिलाओं की एंट्री, दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला का खतना और दूसरे धर्म में शादी करने वाली पारसी महिलाओं को धार्मिक स्थलों में जाने का अधिकार मिले या नहीं, कोर्ट इस पर भी फैसला करेगा।
सुप्रीम कोर्ट में 50 से ज्यादा रिव्यू पिटीशन
धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़े ये सवाल पिछले 26 साल से देश की अलग-अलग अदालतों में पेंडिंग हैं। सुप्रीम कोर्ट में आज से 22 अप्रैल तक 50 से ज्यादा याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई होगी। सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशनरों और उन्हें सपोर्ट करने वाले 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक, जबकि विरोध करने वाले 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक दलीलें दे सकेंगे।