आत्ममंथन

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आत्ममंथन करने में जब मैंने अपनी आत्मा का सानिध्य किया।
आत्मग्लानि से भर उठा मन बस जीवन को यूँही अस्तव्यस्त किया।।
हर  पल  हर  दम  बिना मतलब की इसकी हामी उसकी हामी।
लगता ऐसा जैसे जीवन का सूरज किसी नाकामी से अस्त हुआ।।
इंद्रधनुष रूपी जब जीवन मे कुछ भी अवतरित होने का आभास हुआ।
उम्मीदों की वर्षा का वो बादल आकाश की गोद से विलुप्त हुआ।।
जीवन को अग्रसर करने में प्रयासों की ना कभी कोई कमी रही।
जीवन अग्रसर के रथ के पहिंयो ने भी कब कर्ण का साथ दिया।
कभी किसी के श्राप ने छला,कभी रथ का पहिंया जमीं में जा धसा।
जीवन भर जिसने खुद को गुलाब की तरह ही पौधे से जोड़े रखा।
पर पौधे ने भी गुलाब की तरह कहाँ कांटो के सम्मान को रखा।।

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