गीत के मीत

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जब गीत के मीत बनी मुरली

मुरलीधर की धुन जाग उठी ।

सगरे ब्रज मीत के प्रीत में लीन 

पर गोपियाँ इससे जा रूठीं ।

          वो देखन चाहें आनन को 

          मन मीत न जाए कानन को ।

          अखियन बीच मन मोहन को 

          न पाएँ तो लागत जोहन को ।

न भावत गीत कबो मन को 

सुधि लेती नहिं अपने तन को ।

पा गईं कबो मनभावन को

पथ रोक कहैं मत जावन को ।

          जब मीत की वंशी बजै उर में

          तब अधरों की वंशी कौन सुने ।

          नयनों की भाषा वंशीधर की 

          गोपियाँ होकर मौन सुनें ।

एक डोर बंधी मनमोहन से

सौ डोर टूटी जन जीवन से । 

पर चातक की ही चाहत में 

प्रीत न छुटी मनभावन से ।

          कब सोया जगत जवान हुआ 

          तारे गिन गिन के बिहान हुआ ।

          जब गीत का मीत बसे मन में

          हर पल नटखट नादान हुआ ।

गीत के मीत मिले जबहीं

तबहीं चित आपन सोवत है ।

मनमीत गयो जब मन को लेकर 

अखियाँ खोजत और रोवत हैं ।

          निर्गुण ब्रह्म का उपासक बन

          मुरलीधर को उर में ही धरूँ ।

          जो उनके मन को भावत है

          जग जीवन में वही कर्म करूँ ।

मेरे हर गीत में मीत रहे

जीवन न कभी भयभीत रहे ।

लिखूँ वही जो मनमीत कहे 

हर बोल मोहन की प्रीत कहे ।

– एम•एस•अंसारी”शिक्षक”

कोलकाता पश्चिम बंगाल