आस्था

चढ़ नहीं पायी वह, दोबारा

पुराने मंदिर की सीढ़ियां

जिस पर लगातार तीसरे दिन 

भूखी-प्यासी लोटती रही थी वह

मिन्नतें, उपवास सब हो गए व्यर्थ 

जब चौथे दिन 

कालाजार से लड़ते-लड़ते

परमात्मा में विलीन हो गया बिरजू

हमेशा-हमेशा के लिये।

आस्था!

उम्मीद है असंभव से संभव की ओर

मार्ग है अंधकार से प्रकाश का

पर अंतिम प्रयास की असफलता

कहाँ बचा पाती है आस्था

सीलन भरे कमरे में

दो सालों से बुढ़िया

पड़ी है फटी टाट पर

रोती-बिलखती अपनी ही गोबर-गंदगी में

बहू की गालियों और रूखे टुकड़ों के सहारे

कोने में पड़ी बुढ़िया

रोज तय करती है अतीत से वर्तमान का सफर 

दोषी नहीं पाती किसी को 

ईश्वर के सिवाए

दुहराती है शिकायतें-

भरी जवानी में छीन लिया सुहाग

और आज आंखें फूट गयी हैं जैसे

निर्मोही हर भी नहीं लेता प्राण

सारी ताड़नाओं के बावजूद

बहू-बेटे को असीसती बुढ़िया

बुदबुदाती नजर आ जाती है अक्सर

‘जिसको पति का सुख नसीब नहीं

बेटे से भला क्या उम्मीद’

खुद को समझाने के लिये

गढ़ लिये जाते हैं तर्क

अविश्वसनीय मगर सच यही है

स्त्रियां भले त्याग दें आस्था 

मगर त्याग नहीं पाती 

वात्सल्य!

सुमिता जी,प्रखण्ड विकास अधिकारी

थरथरी नालंदा-बिहार