गांधारी स्थिति को परखती रही पर जहॉं बोलना जरूरी था वहॉं भी नहीं बोल सकी
समीक्षा आलेख – गांधारी की नियति
सुषमा मुनीन्द्र
कई कहानियॉं, कवितायें, लघु कथायें, आलेख, व्यंग्य की रचना करने वाले डॉं0 लोकेन्द्र सिंह कोट का ‘कुछ तो कहो गांधारी’ पहला उपन्यास है। गांधारी नाम सुनते ही महाभारत की गांधारी याद आती है जिसने दृष्टिहीन धृतराष्ट्र के साथ विवाह होने के विक्षोभ या विवशता या विद्रोह स्वरूप ऑंखों पर पट्टी बॉंधने जैसा अमानवीय – अकल्पनीय प्रण कर लिया था। सम्भव है किन्हीं अवसरों पर पछताई हो पर प्रण न छोड़ा। घटित को प्रत्यक्ष: देखने में और मात्र सुनने में भेद होता है। इसीलिये गांधारी स्थिति को परखती रही पर जहॉं बोलना जरूरी था वहॉं भी नहीं बोल सकी या उस तरह नहीं बोल सकी जिस तरह बोलना जरूरी था। ‘कुछ तो कहो गांधारी’ में एक नहीं तीन गांधारी हैं जिनकी नियति महाभारत की गांधारी के आस-पास है। गांधारी – मध्यप्रदेश के मांडव से पच्चीस किलोमीटर दूर बहने वाली नदी है। गांधारी – ग्वालियर रियासत की हवेली में रहने वाले ठाकुरों के घर टहल करने वाले रामदीन की नवोढ़ा पत्नी है। गांधारी – हेरिटेज होटेल (हवेली को हेरिटेज होटेल में परिवर्तित कर दिया गया है) में आने वाली पर्यटक बच्ची है।
लोकेन्द्र सिंह ने सुविचारित भाव से गांधारी नाम का चयन किया है। नदी गांधारी अपने वजूद पर अत्यधिक ऊँचाई वाला बॉंध बनते देख रही है लेकिन पौराणिक पात्र गांधारी की भॉंति असहाय है। रामदीन की पत्नी गांधारी, युवा ठाकुर और उनके मित्रों द्वारा छल से किये गये बलात्कार से आहत है पर इसे टहल करने वालों की नियति मान लेती है। पर्यटक बच्ची गांधारी अनजाने में ठाकुर द्वारा आत्महत्या किये जाने का कारण बनती है। गांधारी नाम को लेखक ने अपनी तर्क शक्ति, कल्पना और समकालीन सच्चाई के सम्मिश्रण से पूर्णता दी है। नदी गांधारी पूरे उपन्यास में विद्यमान है जो इंगित करती है जल स्त्रोत और जल संरचनाओं को बचाना कितना जरूरी है। अभावग्रस्त गांधारी अपनी जद्दोजहद, जरूरतों, जवाब देहियों, जहमतों से स्पष्ट करती है सर्वहारा वर्ग का जीवन कितना कठिन है। बच्ची गांधारी अनजाने में समझा देती है गलत आचरण की एक ग्लानि होती है जो आत्मघाती वृत्ति को उत्पन्न करती है। महाभारत की तरह उपन्यास में समय नैरेटर की भूमिका में है जिसकी नियति मूक दर्शक बने रहना है।
उपन्यास की पृष्ठिभूमि चूँकि पहाड़ी पर बसा मांडव है तो जंगल अपने रहस्य और विस्मय के साथ मौजूद है। पहाड़ी, नदी, हरे वृक्ष, चौमास, रहस्यमय महल, हवेली, विहग, पगडंडियॉं, धान की सोंधी महक जैसी प्राकृतिक छटा उपन्यास के प्रभाव को बढ़ाती है।
संदीप केन्द्रीय पात्र है। कडि़यों के रूप में ठाकुर, रामदीन, गांधारी, गांधारी की पुत्री भवानी, भवानी का पति विजय आदि जुड़ते जाते हैं। मानव मन मस्तिष्क भी जंगल की तरह एक रहस्य है अत: मनुष्य के विचार, व्यवहार बदलते रहते हैं। बचपन में माता:पिता को खो कर मांडव में नाना-नानी के साथ रहने वाला संदीप बारहवीं का छात्र है। जंगल में बनी पगडंडियों से चार किलो मीटर दूर स्कूल जाता है। कन्या शाला की ग्यारहवीं में पढ़ने वाली छात्रा मदालसा भी उसी राह से स्कूल जाती है। दोनों में मित्रता हो जाती है। मदालसा को जंगल की सम्यक जानकारी है। वह संदीप को जंगल के आंतरिक भाग में निर्मित प्राचीन भग्न महल में ले जाती है। एकांत का लाभ ले संदीप उसके साथ कुचेष्टा का उपक्रम करता है। रुष्ट मदालता सहसा अदृश्य हो जाती है। यह विवरण अस्वाभाविक लगता है लेकिन नहीं भी लगता है क्योंकि महल और खण्डहर से ऐसी फंतासी, कीवदंती जुड़ी रहती हैं। मदालसा के अदृश्य होने से संदीप को इतनी आत्मग्लानि होती है कि वह आगे का जीवन पूरी गम्भीरता, कर्तव्य पारायणता, नैतिकता के साथ बिताता है। आई0आई0एम0 करता है, यू0एस0ए0 में चार साल माइक्रो सॉफ्ट में नौकरी करता है लेकिन नदी, गॉंव, आदिवासी उसके अवचेतन में विद्यमान रहते हैं। उनके उत्थान के लिये वह गॉंव लौटता है। स्थानीय एन0जी0ओ0 शुभकामना जो गांधारी पर बनते बॉंध का विरोध कर रहा है को ज्वॉइन करता है। जल्दी ही एन0जी0ओ0 की धूर्तता समझ लेता है कि यह समाज सेवा का नहीं देश-विदेश से धन संग्रह कर अपने स्तर को ऊँचा उठाने की चाल है। वह कहता है ’’गांधारी पर बन रहे बॉंध का मैंने विश्लेषण किया है। बॉंध की ऊँचाई और लोगों के विस्थापन की समस्या है। कितने ही गॉंव वाले आज भी अपना सही मुआवजा नहीं ले पाये हैं। उनका मूल दर्द अपनी जगह को छोड़ना है जिसे कोई नहीं समझ रहा है।‘’ उत्तर में संस्था की सदस्य हेमा
2
कहती है ‘’इन मुद्दों को लेकर और भी एन0जी0ओ0 इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं।‘’ संदीप शुभकामना से अलग होकर अपना संगठन ‘समर्पण’ बनाता है। बॉंध की ऊँचाई कम करने के लिये ग्रामीणों के साथ जल सत्याग्रह करते हुये नदी में धरना देता है। गांधारी पर बन रहे बॉंध और हवेली को हेरिटेज होटेल बनाये जाने के माध्यम से लेखक ने उस पूँजीवाद पर प्रहार किया है जो जमींदारी प्रथा का ही रूप है। ठाकुर की हवेली जो अब आठ हिस्से में बँट चुकी है, सबसे बड़ी जमींदारी का मुख्य केन्द्र रही है। हवेलियों के अपने रहस्य, अहंकार, उपद्रव, दबाव, आर्तनाद, फुसफुसाहटें होती हैं। आठ भाईयों में एक मात्र जीवित सबसे छोटे, बायोपोलर मानसिक बीमारी से पीडि़त वृद्ध ठाकुर हवेली में डोलते-टहलते हुये असमान्य व्यवहार करते हैं ‘’गांधारी चीखती है ………….. उसके साथ अन्याय हुआ है ………….।‘’ वस्तुत: युवावस्था में गांधारी के साथ किये गये बलात्कार की ग्लानि उन्हें मानसिक रूप से बीमार बना देती है। एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी हवेली को हेरिटेज होटेल के तहत खरीदने का प्रस्ताव देती है लेकिन हवेली के अपने हिस्से में अंतिम समय बिता रहे अस्वस्थ ठाकुर सहमत नहीं हैं जबकि उनके भतीजे मुँहमॉंगे दाम पर हवेली को बेंच कर शहर का रुख करते हैं। ठाकुर के रहने के लिये हवेली के तीन कमरों को व्यवस्थित कर उन्हें होटेल के संरक्षक पद पर नियुक्त कर दिया जाता है। होटेल में ठहरने वाले पर्यटक उन्हें देख कर रोमांचित होते हैं कि हवेली के असली मालिक को देख रहे हैं। प्रसन्नता – अप्रसन्नता से निस्पृह ठाकुर ग्लानि में जी रहे हैं। एक पर्यटक बच्ची का नाम गांधारी सुन उन्हें पुराना प्रसंग याद आता है और वे आत्महत्या कर लेते हैं।
संदीप और ठाकुर की तरह रामदीन, गांधारी, भवानी, विजय भी महत्वपूर्ण पात्र हैं जो संदीप के संग्ठन से जुड़ते हैं। संदीप की तरह विजय उस कम्पनी की धूर्तता समझ लेता है जहॉं नौकरी कर रहा है। उसे समझाया जाता है ‘’प्रतियोगिता के इस जमाने में जितना काईंयापन, जितनी चालाकियॉं आप कर सकते हो करो ………… यही है आपका मूल धर्म …………….. (71)।‘’ पंक्तियॉं स्पष्ट करती हैं कार्य स्थल पर महिलाओं के मानसिक, शारीरिक शोषण जैसे उपक्रम होते हैं तो पुरुषों का भी मानसिक, व्यवहारिक शोषण होता है। सिद्धांतप्रिय विजय नौकरी छोड़ देता है।
लोकेन्द्र सिंह पात्रों के चरित्र चित्रण के साथ गॉंव की पृष्ठभूमि में हो रहे बदलाओं को भी बताते चलते हैं कि हेरिटेज होटेल के कारण किस तरह यह गॉंव और आस-पास के गॉंव उन्नत हो गये। सड़क बन गई। शहरी आदत बन कर गॉंव में घुस आया विकास गॉंव के सीमित चाल-चलन को खत्म करने लगा। मायावी बाजार ब्रैण्डेड वस्तु का लोभ दिखा कर गॉंव को बरगलाने लगा। तेली, खाती, लुहार, कुम्हार, मोची, बसोर गॉंव में काम न मिलने से मजदूर बन कर शहर जाने को विवश हुये। गॉंव में हिंसा पनपने लगी। बात-बात में मुकदमे लड़े जाने लगे। संदीप जो गॉंव के लिये मिसाल बन रहा था की हत्या हो जाना हिंसा की पराकाष्ठा है। उपन्यास में संदीप, विजय, ठाकुर, गांधारी की मृत्यु होती है। रह-रह कर प्रश्न उठता है ये पात्र न मरते तो शायद उपन्यास का सकारात्मक पक्ष अधिक मजबूत होता।
बहरहाल यह डॉ0 लोकेन्द्र सिंह का पहला प्रयास है जो उम्मीद देता है भविष्य में वे इससे अच्छे उपन्यास साहित्य जगत को देंगे।
पुस्तक – कुछ तो कहो गांधारी सुषमा मुनीन्द्र
(उपन्यास) द्वारा श्री एम0 के0 मिश्र
लेखक – डॉ0 लोकेन्द्र सिंह कोट जीवन विहार अपार्टमेन्ट
प्रकाशन – कलमकार मंच फ्लैट नं0 7, द्वितीय तल
3, विष्णु विहार, अर्जुन नगर महेश्वरी स्वीट्स के पीछे, रीवा रोड
दुर्गापुर, जयपुर – 302018 सतना (म0प्र0) – 485001
प्रकाशन वर्ष – 2019 मोबाइल – 8269895950
मूल्य – 150/-