कचरा साफ हो रहा है

मुंडे-मुंडे मती भिन्ना।आदमी एक मत का तो है नहीं।यदि एकमत का होता तो देश में न दंगे होते न मारपीट।देश एक सूत्र में रहता बंधकर।एकदम कंप्लीट,सुपर हिट!लेकिनअधिक जोगी मठ उजाड़।महत्वकंक्षाओं का उबाल सिरे से बवाल मचा देता है।इसमें सबका बुरा हाल होता है।कोई हारता है तो मन में खींझ उभरती है।मर जाती है उम्मीद मिट्टी पलीद होती है।

आज एक साहब कह रहे थे-चुनाव में जीत का सेहरा बंधते ही विपक्ष पर व्यंग्य बाण छोड़ना शुरू कर दिए।पिछली बार जनता ने विश्वास कर जीत दर्ज करवाई।और ये जनता के सुनवाई पर कोई ध्यान नहीं दिए।तब इस बार जनता उनको निष्क्रिय व काम करने के प्रति उदासीनता खिन्नता व विफलता देखकर,मारकर पल्टी इस चुनाव में गिरा दियाऔर जो इनके पीठ पीछे खड़ा था उसे आगे बढ़ा दिया।

उसके बाद से जैसा कि इनका फार्मूला है न काम करेंगे और ना किसी को काम करने देंगे।बस जुमलेबाजी,जुगाली और ख्याली पुलाव में जनता हर तरह से अभाव तले जी रही है।जनता को कहीं का ना छोड़ा।भावनाओं को लहूलुहान किया उसे मरोड़ा। तहस-नहस कर रहा देश को आपस में लड़ा कर इंसानियत के धागे को तोड़ा।जिस तरह जनता सरआंखों पर उठाकर रखी थी ये कहां संभाल पाए।बल्किअपने फायदे के लिए जनता के प्रति इनका ध्यान ही नहीं गयाऔर चुनाव आया तो पता चला कि जुमलेबाजी के झूले पर झूलकर सब कुछ भूल किसीऔर कार्यों में मशगूल हो गए थे।जनता को निरीह गाय समझ धर्म का पाठ पढा,बढ़ा-चढ़ाकरअपने प्रचार तंत्र में उलझा कर उन्हें पंगू या गंगू बनाकर किनारे लाकर खड़ा कर दिया।उसी में एक और वर्ग था जोअपने विवेक से कार्य करते मूल भाव समझ इनके गलतआचरणों,नीतियों का विरोध करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे आम जनता को समझ में आने लगी।आज देश का एक बड़ा वर्ग इनका विरोध करने लगी।राजनीति में आते ही जनता की नब्ज टटोलकर उनके प्रति जितना उड़ेलना था उड़ेल दिए।चुनाव में बाजी मारते ही परे धकेल दिए।लेकिन लोकतंत्र में जनता की भावनाओं को तोड़ना,मरोड़ना इनको मंहगा पड़ा।धर्म का नशा जितना चाह रहे थे जनता को देना,उसका विरोध कर उल्टे इनके षड्यंत्रों से वाकिफ होकर इनके गड़े खंभे को हिलाना शुरू कर दी।लगा कि इनके ढुलमूल नीति का मूलभूत सुविधाओं से तालमेल नहीं है।इनका खंभा गिरना शुरू हो गया।धीरे-धीरे बंद मुट्ठी में रेत की तरह राजनीति की जमीन धीरे-धीरे सरकना शुरू हो गई।इनका साम्राज्य जो कायम था जनता के कठोर निर्णय से पिघलना शुरू हो गई है।और दायरा सिमट रही है।निकट भविष्य में ये और मुंह की खाएंगे।ऐसा प्रतीत हो रहा है।

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                         ……. राजेन्द्र कुमार सिंह

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