पाक पत्रकार ने कहा- तुमने पीठ में छुरा घोंपा और भारत ने दरियादिली दिखाकर तुम्हारे 90 हजार सैनिकों की जान बख्शी

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इस्लामाबाद । भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों से चले आ रहे तनावपूर्ण संबंधों के बीच अब पाकिस्तान के भीतर से ही आत्मनिरीक्षण की आवाजें उठने लगी हैं। पाकिस्तान के जाने-माने पत्रकार मोईद पीरजादा के हालिया दावों ने पाकिस्तानी सैन्य स्थापना और वहां के हुक्मरानों की नीतियों को वैश्विक मंच पर बेनकाब कर दिया है। पीरजादा का मानना है कि वर्ष 1947 में विभाजन के बाद से भारत ने जब भी रिश्ते सामान्य करने की कोशिश की, बदले में उसे केवल धोखा ही मिला। उनके इस साहसी स्वीकारोक्ति ने पाकिस्तान की सेना और वर्तमान सैन्य नेतृत्व की साख पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।पीरजादा ने विशेष रूप से 1971 के युद्ध के बाद की घटनाओं का उल्लेख करते हुए पाकिस्तान द्वारा भारत को दिए गए धोखे का कच्चा चिट्ठा खोला है। उन्होंने दावा किया कि 1971 के युद्ध में करारी हार और ढाका में आत्मसमर्पण के बाद, भारत ने एक बड़ा दिल दिखाते हुए 90,000 पाकिस्तानी युद्धबंदियों के साथ बेहद मानवीय और सम्मानजनक व्यवहार किया था।
जिनेवा कन्वेंशन के अनुरूप उन्हें सुरक्षा दी गई और बाद में 1972 के शिमला समझौते के तहत रिहा भी किया गया। इस समझौते की मुख्य शर्त यह थी कि कश्मीर सहित सभी विवादित मुद्दों को केवल द्विपक्षीय बातचीत के माध्यम से हल किया जाएगा। पीरजादा के अनुसार, पाकिस्तान ने इस वादे की पीठ में छुरा घोंपते हुए कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाकर समझौते की धज्जियां उड़ा दीं। पत्रकार की यह तीखी टिप्पणियाँ पाकिस्तान की पंजाबी आर्मी के प्रति उनके बढ़ते असंतोष का हिस्सा हैं। उन्होंने पाकिस्तानी सेना के इतिहास को धोखे और दमन की कहानी करार दिया। पीरजादा ने 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में बंगालियों के नरसंहार से लेकर 1979 में जुल्फिकार अली भुट्टो को दी गई फांसी तक के उदाहरण दिए। उन्होंने वर्तमान सैन्य नेतृत्व पर आरोप लगाया कि सेना का यही रवैया आज भी बरकरार है, जिसका ताजा उदाहरण पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की जेल में बिगड़ती स्थिति है। हाल ही में सोशल मीडिया पर एक चर्चा के दौरान यह बात सामने आई कि भ्रष्टाचार के आरोपों में अगस्त 2023 से जेल में बंद 73 वर्षीय इमरान खान की आंखों की रोशनी खतरनाक स्तर तक कम हो गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनकी दाहिनी आंख की दृष्टि अब मात्र 15 प्रतिशत ही बची है। पीरजादा ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जो सेना अपने नागरिकों और पूर्व प्रधानमंत्रियों के साथ ऐसा व्यवहार कर सकती है, उससे वैश्विक मंच पर ईमानदारी की उम्मीद नहीं की जा सकती। उन्होंने इमरान खान के परिवार से अपील की कि वे अंतरराष्ट्रीय डॉक्टरों और मानवाधिकार संगठनों के माध्यम से इस अंधेपन की साजिश के खिलाफ आवाज उठाएं। कुल मिलाकर, पीरजादा का यह बयान इस बात की पुष्टि करता है कि पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता और भारत के प्रति उसकी शत्रुतापूर्ण नीति का मुख्य केंद्र वहां की सेना रही है। यह पहली बार है जब पाकिस्तान के मुख्यधारा के किसी प्रभावशाली व्यक्ति ने इतनी स्पष्टता से स्वीकार किया है कि भारत के साथ शांति स्थापना में विफलता का कारण नई दिल्ली नहीं, बल्कि इस्लामाबाद और रावलपिंडी का विश्वासघात रहा है। वर्तमान में जनरल आसिम मुनीर के नेतृत्व वाली सेना इन आरोपों को राजनीतिक प्रतिशोध बता रही है, लेकिन पीरजादा के खुलासे ने पाकिस्तान की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी नुकसान पहुंचाया है।