वैश्विक संघर्षों में अब कानूनी नियमों की जगह ताकत की राजनीति हो रही हावी!

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भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने दी चेतावनी
नई दिल्ली । भारत के सीनियर एडवोकेट और पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे ने चेतावनी दी है कि अंतरराष्ट्रीय कानून को सहारा देने वाली वैश्विक नियम-आधारित व्यवस्था कमजोर होती जा रही है। उनका कहना है कि वैश्विक संघर्षों में अब कानूनी नियमों की जगह ताकत की राजनीति हावी होती दिख रही है। हरीश साल्वे ने कहा कि हाल के युद्धों और भू-राजनीतिक तनावों से संकेत मिलता है कि शक्तिशाली देशों पर अंतरराष्ट्रीय कानून का प्रभाव लगातार कम हो रहा है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक साल्वे कहते हैं कि मुझे नहीं लगता आज पब्लिक इंटरनेशनल लॉ कुछ खास देशों के लिए सच में ऑपरेटिव हैं। यह अब ज्यादातर अकादमिक बहस का विषय बन गया है, न कि ऐसा नियम जिसे देश वास्तव में मानें। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जो ढांचा बनाया गया था, वह यूनाइटेड नेशन्स के चार्टर पर आधारित था। इसका उद्देश्य था कि देश बिना वजह ताकत का इस्तेमाल न करें, केवल आत्मरक्षा में या फिर यूनाइटेड नेशन्स सिक्योरिटी काउंसिल की मंजूरी के साथ ही सैन्य कार्रवाई की जाए, लेकिन इन नियमों को अब लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है।
हरीश साल्वे ने कहा कि नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था की बात तो हर कोई करता है, लेकिन आज इसे एक तरफ रख दिया गया है। अब दुनिया में नियमों की नहीं, बल्कि ताकत के आधार पर व्यवस्था चल रही है। इंटरनेशनल कानून के तहत मिलिट्री एक्शन केवल तभी की जा सकती है, जब खतरा तत्काल हो या कोई देश आत्मरक्षा में कदम उठाए, इसके बाद मामले को तुरंत यूएन सिक्योरिटी काउंसिल के सामने रखा जाना चाहिए। जब देश अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन भी करते हैं, तब भी ग्लोबल सिस्टम में उसके खिलाफ प्रभावी कार्रवाई के बहुत कम विकल्प मौजूद हैं।
साफ तौर पर कहें तो बड़े देशों के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई संभव नहीं होती। प्रतिबंधों का असर आमतौर पर छोटे देशों पर ही पड़ता है। साल्वे ने ईरान के उस दावे पर जानकारी दी, जिसमें कहा गया था कि आरिश डेना जहाज, जिस पर तेहरान के मुताबिक भारतीय मेहमान मौजूद थे। उस पर अमेरिका ने श्रीलंका के पास समुद्री क्षेत्र में हमला किया। सल्वे ने कहा कि मुझे लगता है कि यह घटना अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में हुई थी और ऐसे में भारत या श्रीलंका पर कोई कानूनी जिम्मेदारी नहीं बनती।
साल्वे बताते हैं कि संप्रभु देशों को घरेलू अदालतों में जिम्मेदार ठहराने के लिए कानूनी रास्ते बहुत सीमित हैं। किसी भी संप्रभु देश पर इस तरह किसी दूसरे देश की स्थानीय अदालत में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। अगर कोई कानूनी चुनौती दी भी जाए, तो सरकारें सॉवरेन इम्युनिटी का सहारा ले सकती हैं। अगर हम सभी नियमों को किनारे रख दें और कहें कि जिसकी ताकत, उसकी ही बात सही है तो फिर समाधान का रास्ता कहां बचेगा? उन्होंने कहा कि सरकारों पर सबसे प्रभावी नियंत्रण अदालतों या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से नहीं, बल्कि खुद नागरिकों से आता है। लोकतंत्र में जनता की ताकत, जनमत की शक्ति और समझदारी का कोई विकल्प नहीं है। वैश्विक स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि दुनिया दोबारा नियमों के सम्मान को बहाल करे, न कि सैन्य ताकत को अंतरराष्ट्रीय संबंधों का आधार बनने दे।