:: यूनाइटेड नेशन्स के मंच से गूँजी इंदौर की आवाज़; डॉ. जैन ने कहा- महिला शिक्षा सामाजिक खर्च नहीं, देश का सबसे बड़ा निवेश ::
इंदौर । महिलाओं के सशक्तिकरण को केवल किताबी शिक्षा तक सीमित न रखकर उसे आर्थिक ताकत, नेतृत्व क्षमता और निर्णय लेने की शक्ति में बदलना आज के दौर की सबसे बड़ी आवश्यकता है। वैश्विक समुदाय को इस दिशा में अब केवल संवाद नहीं, बल्कि ठोस और समन्वित कदम उठाने होंगे।
यह विचार पीआइएमआर (PIMR) डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी के चांसलर डॉ. डेविश जैन ने व्यक्त किए। वे यूनाइटेड नेशन्स कमीशन ऑन स्टेटस ऑफ विमेन के 70वें सत्र के दौरान आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय समानांतर कार्यक्रम को ऑनलाइन संबोधित कर रहे थे।
:: एक्सेस से एजेंसी की ओर बढ़ने का आह्वान ::
डॉ. जैन ने अपने संबोधन में एक्सेस से एजेंसी (पहुंच से अधिकार) के मंत्र पर जोर दिया। उन्होंने कहा, महिलाओं की शिक्षा कोई सामाजिक खर्च नहीं है, बल्कि यह किसी भी राष्ट्र के लिए सबसे अधिक लाभ देने वाला निवेश है। जब हम एक महिला को शिक्षित करते हैं, तो हम केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के भविष्य को संवारते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब वैश्विक प्रगति का अगला चरण वह होना चाहिए, जहाँ शिक्षा सीधे तौर पर आर्थिक आत्मनिर्भरता और नेतृत्व में परिवर्तित हो सके।
:: भारत में बढ़ती भागीदारी और चुनौतियां ::
भारत की प्रगति का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी अब 50 प्रतिशत के करीब पहुंच चुकी है। हालांकि, उन्होंने आगाह करते हुए कहा कि केवल नामांकन (Enrollment) ही वास्तविक सशक्तिकरण नहीं है। कार्यबल में महिलाओं की कम हिस्सेदारी पर उन्होंने कहा कि यह टैलेंट का अंतर नहीं, बल्कि अवसर का अंतर है, जिसे उद्योग और शिक्षा जगत के बीच बेहतर समन्वय से भरा जा सकता है।
:: इंदौर के संस्थानों ने पेश की मिसाल ::
प्रेस्टीज ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूट्स के अनुभवों को साझा करते हुए डॉ. जैन ने बताया कि उनके संस्थानों ने न केवल 50 प्रतिशत महिला नामांकन सुनिश्चित किया है, बल्कि डिजिटल साक्षरता अभियान के जरिए एक लाख से अधिक ग्रामीण महिलाओं को ऑनलाइन उद्यमिता और डिजिटल लेनदेन के लिए प्रशिक्षित भी किया है।
:: निर्णायक कार्रवाई का समय ::
अंत में, उन्होंने विश्वविद्यालयों और सरकारों से अपील की कि वे एक मजबूत मेंटरशिप नेटवर्क विकसित करें और महिला उद्यमियों के लिए वित्तीय अवसरों के द्वार खोलें। उन्होंने दोहराया कि अब समय केवल चर्चाओं का नहीं, बल्कि निर्णायक कार्रवाई का है ताकि हर महिला को सीखने के साथ-साथ नेतृत्व करने का समान अवसर मिले।

