:: एकात्म पर्व का दूसरा दिन : अद्वैत दर्शन और आधुनिक विज्ञान के समन्वय पर मंथन; सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने मोहा मन ::
ओंकारेश्व/इंदौर । आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास और संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित पांच दिवसीय एकात्म पर्व के दूसरे दिन शनिवार को वैचारिक विमर्श और सांस्कृतिक चेतना का अनूठा संगम देखने को मिला। विद्वानों ने स्पष्ट किया कि अद्वैत दर्शन केवल आध्यात्मिक ज्ञान नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का सबसे बड़ा आधार है। जब हम प्रकृति को स्वयं से अलग मानते हैं, तभी संकट शुरू होता है।
रामकृष्ण मिशन पर आधारित विशेष सत्र में स्वामी वेदतत्त्वानंद पुरी ने कहा कि मिशन को केवल एक संस्था मानना इसकी व्यापकता को सीमित करना होगा। उन्होंने शिव ज्ञाने जीव सेवा के मंत्र को समझाते हुए कहा कि सेवा औपचारिकता नहीं, बल्कि हर जीव में शिव का दर्शन है। स्वामी सर्वभद्रानंद ने मिशन की स्थापना और स्वामी रामकृष्ण परमहंस के विरले व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला, जबकि स्वामी जापसिद्धानंद ने तोतापुरी बाबा और माँ शारदा देवी के योगदान को रेखांकित किया।
:: हम मालिक नहीं, पर्यावरण के संरक्षक हैं ::
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के भारत प्रमुख डॉ. बालकृष्ण पिसुपति ने ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या के सूत्र से पर्यावरण को जोड़ा। उन्होंने कहा कि मनुष्य ने नदियों और जीव-जगत को सीमाओं में बांटने की कोशिश की है, जबकि प्रकृति कोई सीमा नहीं मानती। हम संसाधनों के मालिक नहीं, संरक्षक हैं। पिसुपति ने सलाह दी कि हमें अपनी सुविधाप्रधान जीवनशैली में बदलाव की शुरुआत स्वयं से करनी होगी। वहीं सौर गांधी चेतन सिंह सोलंकी ने बढ़ती जरूरतों और सीमित संसाधनों पर चिंता जताते हुए कहा कि हम अपनी जरूरतों को सीमित कर भी पर्यावरण को सुरक्षित रख सकते हैं।
:: मंच पर जीवंत हुआ अद्वैत दर्शन ::
पुण्य सलिला नर्मदा के तट पर आयोजित इस पर्व में सांस्कृतिक संध्या ने आदि गुरु शंकर की रचनाओं को मंच पर साकार कर दिया। प्रसिद्ध नृत्यांगना शुभदा वराड़कर ने ओड़िसी शैली में स्तोत्रों पर भावपूर्ण प्रस्तुति दी। पद्मजा सुरेश ने भरतनाट्यम के जरिए सौंदर्य लहरी और आदि शक्ति के तेज को दर्शाया। जब निर्वाणषटकम् के स्वर गूंजे, तो पूरा वातावरण एकात्म भाव में सराबोर हो गया।
कार्यक्रम में यह तथ्य प्रमुखता से उभरा कि मात्र आठ वर्ष की आयु में आचार्य शंकर ने इसी पावन भूमि पर नर्मदाष्टकम् की रचना की थी। उनके द्वारा रचित गंगा, यमुना और नर्मदा के स्तोत्र आज भी पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरणा पुंज बने हुए हैं। एकात्म पर्व के इन सत्रों ने सिद्ध कर दिया कि शंकर का ज्ञान केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं, बल्कि संगीत, नृत्य और लोक संस्कृति के कण-कण में रचा-बसा है।

