वॉशिंगटन । अमेरिका स्थित प्रमुख थिंक टैंक, इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ वॉर की हालिया रिपोर्ट ने ईरान के शीर्ष नेतृत्व के भीतर चल रहे गहरे सत्ता संघर्ष का पर्दाफाश किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान की विदेश नीति और कूटनीति के भविष्य को लेकर कट्टरपंथी और नरमपंथी गुटों के बीच जारी खींचतान में फिलहाल कट्टरपंथियों ने निर्णायक बढ़त बना ली है। इस आंतरिक लड़ाई में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के कमांडर ब्रिगेडियर जनरल अहमद वाहिदी का दबदबा बढ़ा है, जबकि पश्चिमी देशों के साथ बातचीत के पैरोकार माने जाने वाले संसद अध्यक्ष मोहम्मद बघेर गालिबाफ हाशिए पर नजर आ रहे हैं।
आकलन के अनुसार, जनरल वाहिदी ने कूटनीतिक लचीलापन दिखाने की गालिबाफ की कोशिशों को लगातार नाकाम किया है। वाहिदी का उदय इस बात का संकेत है कि ईरान अब अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ किसी भी प्रकार के समझौते के बजाय सीधे टकराव का जोखिम उठाने को तैयार है। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि प्रभाव घटने और परमाणु रियायतों पर हुए विवाद से हताश होकर गालिबाफ ने इस्तीफा देने का मन बना लिया है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि बचाने के लिए ईरान सरकार ने राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन, गालिबाफ और न्यायपालिका प्रमुख की एक साथ तस्वीर साझा कर एकजुटता दिखाने का प्रयास किया है। स्वयं गालिबाफ ने सोशल मीडिया पर किसी भी गुटबाजी से इनकार करते हुए कहा है कि पूरा देश सर्वोच्च नेता के आदेशों का पालन करने के लिए एकजुट है। यह कूटनीतिक उथल-पुथल ऐसे समय में हो रही है जब पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में एक महत्वपूर्ण त्रिपक्षीय वार्ता की संभावना बन रही है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची इस्लामाबाद पहुंच चुके हैं, जहां उनके अमेरिकी विशेष दूतों स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर से मिलने की उम्मीद है। जानकारों का मानना है कि इस्लामाबाद में होने वाली ये बैठकें इस बात का प्रमाण होंगी कि ईरान कूटनीतिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ेगा या जनरल वाहिदी के प्रभाव में टकराव का रास्ता अख्तियार करेगा। फिलहाल, पर्दे के पीछे की सच्चाई यही इशारा कर रही है कि ईरान की सत्ता पर कट्टरपंथियों की पकड़ बेहद मजबूत हो चुकी है।

