नई दिल्ली । आम आदमी पार्टी छोड़कर हाल ही में भाजपा का दामन थामने वाले राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा को पार्टी की कार्यसंस्कृति और प्रोटोकॉल का पहला सबक मिल गया है। भाजपा में शामिल होने के तुरंत बाद, पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ अपनी पहली मुलाकातों के दौरान ही उन्हें संगठन के भीतर संबोधन और अनुशासन की बारीकियों से अवगत कराया गया। यह वाक्या उस समय का है जब राघव चड्ढा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से शिष्टाचार भेंट करने पहुंचे थे।
सूत्रों के अनुसार, बातचीत के दौरान राघव चड्ढा ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष को तीन-चार बार उनके नाम नितिन नवीन जी कहकर संबोधित किया। राघव चड्ढा की यह संबोधन शैली वहां मौजूद भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ को रास नहीं आई। चुघ ने तुरंत हस्तक्षेप किया और चड्ढा को धीरे से टोकते हुए याद दिलाया कि भाजपा की परंपरा और अनुशासन के अनुसार, राष्ट्रीय अध्यक्ष को नाम के बजाय अध्यक्ष जी या राष्ट्रीय अध्यक्ष जी कहकर संबोधित किया जाना चाहिए। भाजपा में व्यक्ति से ऊपर पद और पद से ऊपर संगठन को रखने की परंपरा रही है, जिसका पालन करना प्रत्येक सदस्य के लिए अनिवार्य है।
यह पहला मौका नहीं है जब नितिन नवीन को लेकर इस तरह के निर्देश सामने आए हों। जब उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, तभी पार्टी ने स्पष्ट कर दिया था कि संगठन में पद सर्वोपरि है। चूंकि वर्तमान अध्यक्ष उम्र और अनुभव के लिहाज से कई वरिष्ठ नेताओं से छोटे हैं, इसलिए अक्सर पुराने परिचित या वरिष्ठ नेता उन्हें नाम से संबोधित कर देते थे। इस पर अंकुश लगाने के लिए पार्टी ने सभी पदाधिकारियों को सख्त हिदायत दी थी कि आपसी चर्चाओं और बैठकों के दौरान प्रोटोकॉल का पूरा ध्यान रखा जाए। भाजपा के इस कड़े रुख के पीछे पार्टी की कैडर आधारित विचारधारा है। जनसंघ के काल से ही चली आ रही इस परंपरा के तहत वरिष्ठ नेताओं और विशेष रूप से सर्वोच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों को व्यक्तिगत नाम से पुकारना अनुशासनहीनता माना जाता है। निर्देश स्पष्ट हैं कि नेताओं के बीच निजी संबंध चाहे जो भी रहे हों, लेकिन औपचारिक चर्चा के दौरान पद की गरिमा के अनुरूप ही सम्मानजनक शब्दों का प्रयोग होना चाहिए। राघव चड्ढा के लिए भाजपा का यह पहला अनुभव पार्टी के भीतर के उस कड़े अनुशासन को दर्शाता है, जहाँ व्यक्तिगत पहचान से अधिक संगठन के ढांचे को महत्व दिया जाता है।

