ईरान-अमेरिका वार्ता से वैश्विक बाजार में हलचल
नई दिल्ली । वैश्विक ईंधन संकट से जूझ रही दुनिया के लिए एक बेहद राहत भरी खबर सामने आ रही है। ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतों में 2 फीसदी से भी ज्यादा की भारी गिरावट दर्ज की गई है। डब्लूटीआई क्रूड का भाव फिसलकर 87.36 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है, जबकि ब्रेंट क्रूड की कीमतें भी घटकर 91.12 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर चल रही हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी संकेत दिया है कि ईरान के साथ शांति समझौते पर अंतिम चरण की बातचीत जारी है। हालांकि, ईरान के विदेश मंत्रालय का कहना है कि अभी किसी अंतिम समझौते पर मुहर नहीं लगी है और वार्ता प्रक्रियाधीन है। इसके बावजूद वाशिंगटन के रुख से साफ है कि वह ईरान के साथ न्यूक्लियर मुद्दे पर नए सिरे से हाथ मिलाने को तैयार दिख रहा है।
वैश्विक ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान में होर्मुज के रास्ते पर दोनों देशों के कड़े रुख के कारण सैकड़ों मालवाहक जहाज फंसे हुए हैं। यदि यह कूटनीतिक गतिरोध सुलझता है और होर्मुज से व्यापारिक गतिविधियां पूरी तरह बहाल होती हैं, तो आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे आ सकती हैं। दरअसल, इस विवाद की वजह से ग्लोबल मार्केट में क्रूड का भंडार पहले ही करीब 2 करोड़ बैरल नीचे खिसक चुका है, जिसे लेकर विश्व बैंक और आईएमएफ जैसी संस्थाओं ने भी ईंधन संकट गहराने की चेतावनी दी थी।
इस रास्ते के खुलने से सबसे बड़ी राहत भारत को मिलने वाली है। जहाजरानी मंत्रालय के निदेशक ओपेश कुमार शर्मा के अनुसार, भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए इस जलमार्ग पर अत्यधिक निर्भर है। भारत अपनी कुल जरूरत का करीब 30 फीसदी कच्चा तेल और कुल एलपीजी आयात का 70 फीसदी हिस्सा इसी मार्ग से मंगाता है। वर्तमान में होर्मुज क्षेत्र में भारत के 13 व्यापारिक जहाज फंसे हुए हैं, जिनमें कच्चे तेल, एलपीजी, रसायन और कंटेनरों से लदे पोत शामिल हैं जो रास्ता साफ होने का इंतजार कर रहे हैं। इस बीच, 2.70 लाख मीट्रिक टन कच्चा तेल लेकर आ रहे एक बड़े भारतीय टैंकर निसोस केरोस ने सफलतापूर्वक इस क्षेत्र को पार कर लिया है, जिसके 3 जून तक विशाखापट्टनम बंदरगाह पहुंचने की उम्मीद है। बता दें कि ईरान और अमेरिका के बीच शांति समझौते की संभावनाएं तेजी से बलवती हो रही हैं, जिससे उम्मीद जगी है कि दोनों देश जल्द ही किसी सकारात्मक नतीजे पर पहुंच जाएंगे। इस कूटनीतिक हलचल का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर दिखाई दे रहा है, जो शनिवार सुबह फिसलकर पिछले छह सप्ताह यानी डेढ़ महीने के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। माना जा रहा है कि यदि दोनों देशों के बीच सहमति बनती है तो रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य का रास्ता दोबारा खुल जाएगा, जिससे भारतीय जहाजों की आवाजाही सुगम होगी और देश में कच्चे तेल व गैस का संकट पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।

