प्रौढ़ महिला को अपनी पसंद से रहने का पूरा अधिकार, माता-पिता या पुलिस नहीं कर सकते मजबूर- बॉम्बे हाईकोर्ट

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मुंबई । प्रौढ़ महिला को अपनी इच्छा के अनुसार रहने, विवाह करने या न करने तथा उच्च शिक्षा प्राप्त करने का पूर्ण कानूनी अधिकार है। उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध मायके लौटने के लिए न तो राज्य की कोई एजेंसी और न ही उसके माता-पिता मजबूर कर सकते हैं। यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने तेलंगाना पुलिस को 21 वर्षीय युवती के खिलाफ किसी भी प्रकार की जबरदस्ती की कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया है। प्रभारी मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अंखड की खंडपीठ ने 2 जुलाई को दिए अपने आदेश में कहा कि संबंधित युवती हैदराबाद स्थित अपने माता-पिता के घर से अपनी स्वतंत्र इच्छा से निकली थी। चूंकि वह बालिग है, इसलिए उसे यह तय करने का पूरा अधिकार है कि वह कहां रहेगी, शादी करेगी या नहीं करेगी तथा आगे की पढ़ाई करेगी या नहीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस युवती को ‘लापता व्यक्ति’ मानकर उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकती और न ही उसे जबरन उसके माता-पिता के पास वापस भेज सकती है। अदालत ने तेलंगाना पुलिस को निर्देश दिया कि युवती के माता-पिता द्वारा दर्ज कराई गई गुमशुदगी की शिकायत वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की जाए। युवती की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मिहिर देसाई के माध्यम से दायर याचिका में बताया गया कि उसने जून 2026 में अपने दत्तक माता-पिता का घर छोड़ दिया था। उसका आरोप था कि परिवार उस पर अपने से लगभग दस वर्ष बड़े चचेरे भाई से विवाह करने का दबाव बना रहा था, जबकि वह ऐसा नहीं चाहती थी। उसने यह भी कहा कि उसका परिवार अत्यधिक रूढ़िवादी और पारंपरिक सोच वाला है, जिसके कारण उसे स्नातक की पढ़ाई पूरी करने और नौकरी करने की भी अनुमति नहीं दी जा रही थी। साथ ही, परिवार की ओर से मिल रही धमकियों और मानसिक उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करने की मांग भी अदालत से की गई थी। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने युवती से व्यक्तिगत रूप से बातचीत की। इस दौरान उसने अदालत को बताया कि वह वर्तमान में मुंबई में एक स्वयंसेवी संस्था के साथ कार्य कर रही है और पेइंग गेस्ट के रूप में रह रही है। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि उसे मात्र दो महीने की उम्र में गोद लिया गया था। मामले की सुनवाई के दौरान युवती की दत्तक मां ने अदालत में शपथपत्र दाखिल कर भरोसा दिलाया कि बेटी पर उसकी इच्छा के विरुद्ध विवाह का कोई दबाव नहीं डाला जाएगा और उसकी उच्च शिक्षा में भी कोई बाधा नहीं पहुंचाई जाएगी। इसके बावजूद युवती ने अदालत के समक्ष स्पष्ट रूप से कहा कि वह अपने घर वापस नहीं जाना चाहती। युवती की स्पष्ट इच्छा और उसके बालिग होने के अधिकार को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि कानून के अनुसार किसी भी प्रौढ़ महिला को अपने जीवन से जुड़े फैसले स्वयं लेने का अधिकार है और उसकी स्वतंत्रता में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।