हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले की पार्वती घाटी में, समुद्र तल से लगभग 1,760 मीटर की ऊँचाई पर स्थित मणिकर्ण महादेव भारत के उन विरले तीर्थों में से एक है जहाँ प्रकृति, अध्यात्म और पौराणिक इतिहास एक-दूसरे में समाहित दिखाई देते हैं। पार्वती नदी के तट पर बसे इस पवित्र धाम में स्थित प्राकृतिक उष्ण जलकुंड (Hot Springs) आज भी श्रद्धालुओं और वैज्ञानिकों दोनों के लिए कौतूहल का विषय बने हुए हैं। यहाँ का जल इतना गर्म होता है कि उसमें चावल, दाल और अन्य प्रसाद पकाए जाते हैं।
मणिकर्ण नाम की उत्पत्ति : ‘मणिकर्ण’ शब्द दो संस्कृत शब्दों से मिलकर बना है— मणि अर्थात रत्न और कर्ण अर्थात कान। पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी स्थान पर माता पार्वती के कर्णाभूषण (कुंडल) की मणि जलधारा में गिर गई थी। उसी घटना के कारण इस स्थान का नाम “मणिकर्ण” पड़ा।
भगवान शिव और माता पार्वती की दिव्य कथा: पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती ने पार्वती घाटी की अलौकिक सुंदरता से प्रभावित होकर यहाँ दीर्घकाल तक तप और विहार किया। एक दिन जलक्रीड़ा के दौरान माता पार्वती के कान की मणि नदी में गिर गई। भगवान शिव ने अपने गणों को उसे खोजने का आदेश दिया, किन्तु वे असफल रहे।
जब मणि नहीं मिली तो भगवान शिव अत्यंत रुष्ट हो गए। उनके क्रोध से सम्पूर्ण सृष्टि विचलित होने लगी। तब देवताओं ने शेषनाग से प्रार्थना की। शेषनाग ने अपनी प्रचंड फुफकार से पृथ्वी के भीतर से उबलते जल का विशाल फव्वारा प्रकट किया, जिसके साथ अनेक रत्न और वही खोई हुई मणि बाहर आ गई। तभी से यहाँ निरंतर उबलते हुए गर्म जलस्रोत प्रवाहित होते हैं और यह स्थान “मणिकर्ण” के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
उबलते जल का वैज्ञानिक रहस्य : धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ भूवैज्ञानिकों के अनुसार मणिकर्ण के गर्म जलस्रोत पृथ्वी की गहराइयों में सक्रिय भू-तापीय (Geothermal) गतिविधियों का परिणाम हैं। इन जलस्रोतों का तापमान लगभग 64 से 80 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है। इनका जल लंबे समय से स्नान, प्रसाद पकाने तथा धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोग किया जाता रहा है।
झुका हुआ प्राचीन शिव मंदिर : मणिकर्ण का प्राचीन शिव मंदिर भी अत्यंत प्रसिद्ध है। माना जाता है कि 1905 के विनाशकारी कांगड़ा भूकंप के बाद यह मंदिर थोड़ा झुक गया, किन्तु आज भी उसी अवस्था में श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। स्थानीय लोगों के अनुसार यह स्वयं भगवान शिव की दिव्य उपस्थिति का प्रतीक है।
हिन्दू और सिख—दोनों की समान आस्था : मणिकर्ण केवल हिन्दू धर्म का ही नहीं, बल्कि सिख धर्म का भी अत्यंत पवित्र तीर्थ है। मान्यता है कि प्रथम सिख गुरु, गुरु नानक देव जी अपने शिष्य भाई मरदाना के साथ यहाँ आए थे। जब भोजन बनाने के लिए अग्नि उपलब्ध नहीं थी, तब गुरु नानक जी के आशीर्वाद से धरती से गर्म जल फूट पड़ा और उसी जल में रोटियाँ एवं भोजन तैयार हुआ। आज भी गुरुद्वारे के लंगर में इस परंपरा की स्मृति जीवित है।
धार्मिक महत्व : हिन्दू श्रद्धालु मानते हैं कि यहाँ स्नान करने से अनेक शारीरिक कष्टों से राहत मिलती है तथा भगवान शिव और माता पार्वती का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। कुल्लू घाटी के अनेक देवता भी परंपरागत अवसरों पर मणिकर्ण की यात्रा करते हैं, जिससे इस धाम का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है।
यात्रा जानकारी- राज्य: हिमाचल प्रदेश
– जिला: कुल्लू, – निकटतम स्थान: कसोल (लगभग 4 किमी), – भुंतर से दूरी: लगभग 35 किमी – कुल्लू से दूरी: लगभग 45 किमी
– सर्वश्रेष्ठ समय: मार्च से जून तथा सितंबर से नवंबर।
निष्कर्ष : मणिकर्ण महादेव केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि शिव और शक्ति की दिव्य लीला, प्रकृति के अद्भुत रहस्य और सनातन आस्था का जीवंत प्रतीक है। यहाँ बहते उबलते जलस्रोत श्रद्धालुओं को भगवान शिव के क्रोध, माता पार्वती की करुणा और शेषनाग की दिव्य भूमिका की याद दिलाते हैं। हिमालय की गोद में स्थित यह धाम आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए विश्वास, तपस्या और चमत्कार का पावन केंद्र बना हुआ है। बीजल जगड,मुंबई, घाटकोपर।

