मोहन मामा के राज में भंजियां हाथों में छाता , लेकर 2 किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर*
कमलेश सोनी
पलसुद :- जहां लगातार शिकायतों और समाचार के प्रकाशन के बाद भी कुंभकरण की नींद से नहीं जाग रहे है! जिम्मेदार अधिकारी कर्मचारी जिनके कारण मामा के राज मे उनकी भंजियो को प्रति दिन 2 किलोमीटर पैदल चलनें को मजबुर होना पढ़ रहा है एक तरफ तो प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव प्रदेश की बेटियों को भांजियो का दर्जा देकर संरक्षण और देखभाल की बात कररहे है! वही बड़वानी जिले के नगर पलसुद की कस्तूरबा छात्रावास में पढ़ने वाली बालिकाओं को स्कूल में पढ़ने के लिए प्रतिदिन जान जोखिम में डालकर लगभग 2 किलोमीटर का सफर पैदल तय करना होता है! खास बात तो यह है कि यह सफर गर्मी, बरसात, सर्दी, के दिनों में भी तय करना होता है! साथ ही साथ जिस मार्ग से बालिकाए आती -जाती है! वो खैतिया और बड़वानी का मुख्य मार्ग है! जिस पर दिन भर बड़े-बड़े डंपर ट्राले भारी- भारी वाहनों से आगमन चलता रहता है! जिससे कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है! कुछ दिनों पहले इस मार्ग पर एक निजी स्कूल की बालिका स्कूल जाते समय आईसर की चपेट में आने से उसकी मृत्यु हो चुकी थी उसके बाद भी जिम्मेदार इस समस्या पर मुक दर्शक बने हुए हैं! और इन्हें लगभग 200 बालिकाओं की सुरक्षा की कोई चिंता ही नहीं है! सफर करने वाली बालिकाओं में कई बालिका तो बहुत छोटी है!
*कब तक रोजाना ऐसी चलेगी बालिकाएं*
प्रतिदिन इस तरह से बालिकाओं के चलने से काफी दिक्कत उन बालिकाओं को होती है! जो थक गई है या फिर बीमारी से ग्रसित है और रोज बालिकाओं के आने जाने से समय की भी काफी बर्बादी होती है और थकान भी!
*क्यों न शिक्षक और शिक्षिका को ही छात्रावास में पढ़ाने भेजा जाए या स्कूल बस संचालित की जाए*
सभी बच्चों को रोजाना पैदल चलने से बेहतर होगा कि हम शिक्षक और शिक्षिका को ही छात्रावास में पढ़ने भेज दे जिससे सभी छोटी बडी बालिकाओं को पैदल चलकर सफर नहीं करना पड़ेगा या फिर बच्चों को पढ़ाने के लिए अन्य कोई वैकल्पिक स्कूल बस संचालित कर व्यवस्था की जाए जिससे की बालिकाओं की जान जोखिम में ना पढ़े और थकान और बिमारी के दिनों में भी पढ़ सके
*पलसुद थाने के सामने से निकलती है! प्रति दिन 200 बालिकाएं*
जिस रास्ते से प्रतिदिन 200 के लगभग बालिकाएं कस्तूरबा छात्रावास से पैदल स्कूल जाती- आती है! उसी मार्ग पर पुलिस थाना भी है! जहां हेलमेट को लेकर पुलिस द्वारा प्रतिदिन चालानी कार्रवाई की जाती है! तो क्या बालिकाओं की सुरक्षा पुलिस की नहीं बनती है
*मुख्य रास्ते पर ही मटन और मछली मार्केट*
जिस रास्ते से प्रतिदिन बालिकाएं निकलती है उसी मुख्य रास्ते पर ही मटन और मछली मार्केट भी लगता है जिससे बालिकाओं कि मनस्थति पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है

