नई दिल्ली । देश में प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और संगठित नकल के बढ़ते मामलों पर अंकुश लगाने के मकसद से केंद्र की मोदी सरकार ने सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 को लोकसभा से पारित कराया है। यह विधेयक 2024 के एंटी-पेपर लीक कानून को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए लाया गया है। केंद्र सरकार का मानना है कि नए प्रावधान परीक्षा माफिया पर कड़ी कार्रवाई, समयबद्ध जांच और दोषियों को शीघ्र सजा सुनिश्चित करने वाले है। जिससे सार्वजनिक परीक्षा प्रणाली में विश्वास बहाल होगा।
संशोधन के तहत, पेपर लीक या अन्य अनुचित साधनों में शामिल व्यक्तियों के लिए सजा को तीन से पांच वर्ष के बजाय अब पांच से 10 वर्ष तक बढ़ाया गया है। अधिकतम जुर्माना भी 10 लाख से बढ़ाकर 50 लाख रुपये किया है। वहीं, यदि परीक्षा आयोजित कराने वाली एजेंसी, आईटी कंपनी, प्रिंटिंग एजेंसी या अन्य सेवा प्रदाता धोखाधड़ी में शामिल होते हैं, तब उन पर पांच करोड़ रुपये तक का भारी जुर्माना लगाया जा सकेगा। संगठित परीक्षा माफिया के खिलाफ भी कानून को अधिक कठोर किया गया है। इसतरह के मामलों में न्यूनतम सजा अब सात वर्ष और जुर्माना बढ़ाकर 10 करोड़ रुपये किया गया है। दोषी पाए जाने वाले सेवा प्रदाताओं को आठ वर्ष तक किसी भी सार्वजनिक परीक्षा से जुड़े कार्य से प्रतिबंधित रखा जा सकेगा, जिससे उन्हें भविष्य में इसतरह के कृत्यों से रोका जा सके।
जांच प्रक्रिया को समयबद्ध और अधिक कुशल बनाने का लक्ष्य तय किया गया है। पेपर लीक से जुड़े मामलों की जांच दो माह के भीतर पूरी करने तथा आरोपपत्र दाखिल होने के बाद तीन माह के भीतर मुकदमे के निपटारे का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके लिए प्रत्येक राज्य और केंद्रशासित प्रदेश में विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतें नामित की जाएंगी। आवश्यकता पड़ने पर केंद्र सरकार विशेष जांच दल (एसटीएफ) का गठन भी कर सकेगी। यह कानून यूपीएससी, एसएससी, रेलवे भर्ती बोर्ड, आईबीपीएस तथा एनटीए द्वारा आयोजित नीट, जेईई, सीयूईटी सहित केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित सभी प्रमुख सार्वजनिक परीक्षाओं पर लागू होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि कानून का प्रभावी क्रियान्वयन ही तय करेगा कि यह पेपर लीक और परीक्षा माफिया पर कितनी प्रभावी रोक लगा पाता है।

