हॉकी-फुटबॉल टीम के कप्तान रहे राहत इंदौरी को, शायरी से मिली शोहरत

ताज़ा खबर देश-विदेश

मुंबई । राहत इंदौरी का नाम आते ही उनकी चर्चित पंक्ति ‘बुलाती है मगर जाने का नहीं’ लोगों के जेहन में आ जाती है। अपनी बेबाक शायरी और दमदार अंदाज से उन्होंने देश-दुनिया में अलग पहचान बनाई। उनकी शायरी में मोहब्बत, रिश्ते, जिंदगी, समाज और आम आदमी की परेशानियों की झलक दिखाई देती थी। हालांकि, शायरी की दुनिया में शोहरत हासिल करने वाले राहत इंदौरी का एक और पहलू भी था—उन्हें खेलों से गहरा लगाव था और वह हॉकी और फुटबॉल खेल चुके थे।
राहत इंदौरी का जन्म 1 जनवरी 1950 को मध्य प्रदेश के इंदौर में हुआ था। उनका असली नाम राहत कुरैशी था। इंदौर से उनका रिश्ता इतना गहरा था कि उन्होंने अपने नाम के साथ ‘इंदौरी’ जोड़ लिया। बचपन और शुरुआती जीवन इंदौर में बिताने के दौरान शहर और उसके आसपास का सामाजिक माहौल उनके व्यक्तित्व पर गहरा असर डालता रहा। बाद में यही अनुभव उनकी शायरी में भी नजर आए। राहत इंदौरी ने एक इंटरव्यू में बताया था कि शुरुआती दौर में वह खुद को खिलाड़ी के तौर पर देखते थे। वह हॉकी और फुटबॉल दोनों खेलते थे और स्कूल-कॉलेज के स्तर पर टीमों की कप्तानी भी कर चुके थे। उनके लिए मैदान केवल खेल की जगह नहीं था, बल्कि वहां उन्होंने नेतृत्व, जिम्मेदारी और टीम के साथ आगे बढ़ने की कला भी सीखी। हालांकि, समय के साथ उनका रुझान उर्दू साहित्य और शायरी की ओर बढ़ता गया। उर्दू साहित्य में उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद राहत इंदौरी मुशायरों की दुनिया में तेजी से पहचान बनाने लगे। उनकी खासियत यह थी कि उनकी शायरी की भाषा आम लोगों से जुड़ी हुई थी। वह प्रेम और रिश्तों पर लिखते तो श्रोता भावनाओं से जुड़ जाते और जब समाज, राजनीति या व्यवस्था पर सवाल उठाते तो उनके शब्दों में विरोध और बेबाकी साफ दिखाई देती।
इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में उनकी पुरानी शायरी नई पीढ़ी तक भी पहुंची। ‘बुलाती है मगर जाने का नहीं’ जैसी पंक्तियां खूब लोकप्रिय हुईं और सोशल मीडिया पर अलग-अलग अंदाज में इस्तेमाल की गईं। हालांकि, उनकी लोकप्रियता केवल इंटरनेट की देन नहीं थी। दशकों तक देश-विदेश के मुशायरों में उन्होंने अपनी खास शैली से दर्शकों के बीच मजबूत पहचान बनाई थी।
फिल्मों के लिए भी लिखे गीत
राहत इंदौरी ने फिल्मों के लिए भी गीत लिखे। उनके लिखे चर्चित गीतों में ‘इश्क’ का ‘नींद चुराई मेरी’, ‘करीब’ का ‘चोरी-चोरी जब नजरें मिलीं’, ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ का ‘छन छन’ और ‘मर्डर’ का ‘दिल को हजार बार रोका’ शामिल हैं। 11 अगस्त 2020 को 70 वर्ष की उम्र में राहत इंदौरी का निधन हो गया। कोरोना संक्रमण के दौरान उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनके निधन से साहित्य और फिल्म जगत में शोक की लहर दौड़ गई। आज भी उनकी शायरी लोगों के बीच उसी बेबाक अंदाज में जिंदा है, जिसके लिए उन्हें याद किया जाता है।