पुस्तक समीक्षा:उपन्यास स्टेलमेट : एक स्त्री के बहाने हमारे समय के सवाल

साहित्य

किसी भी उपन्यास की असली शक्ति उसके कथानक में नहीं, बल्कि इस बात में होती है कि वह अपने पात्रों के साथ पाठक का रिश्ता कितना गहरा बना पाता है। हाल ही में प्रकाशित दीपक गिरकर का उपन्यास ‘स्टेलमेट’ इसी अर्थ में उल्लेखनीय है। यह किसी रहस्य, रोमांच या घटनाओं की तेज़ रफ्तार से पाठक को बाँधने का प्रयास नहीं करता। इसकी खूबसूरती जीवन के सामान्य दिखने वाले प्रसंगों में छिपी असाधारण मानवीय संवेदनाओं को सामने लाने में है। उपन्यास पढ़ते हुए महसूस होता है कि लेखक दरअसल एक स्त्री के जीवन के बहाने हमारे समय के अनेक सामाजिक और नैतिक प्रश्नों से संवाद कर रहे हैं।

उपन्यास की शुरुआत ही उसे विशिष्ट बना देती है। कथा जेल की सलाखों के पीछे से आरंभ होती है। कैद में बैठी माधवी अपने जीवन की यात्रा को स्मृतियों के सहारे पाठक के सामने खोलती है। यह आत्मकथात्मक शैली केवल शिल्पगत प्रयोग नहीं है; यही उपन्यास की विश्वसनीयता का आधार बनती है। पाठक शुरू से ही जानना चाहता है कि एक शिक्षित, संवेदनशील और सफल स्त्री जेल तक कैसे पहुँची। यही जिज्ञासा कथा को आगे बढ़ाती है।

माधवी का चरित्र इस उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि है। वह किसी आदर्शवादी प्रतिमा की तरह नहीं गढ़ी गई, बल्कि अपने समय की एक सामान्य भारतीय स्त्री की तरह विकसित होती है। वह प्रेम करती है, परिवार से संघर्ष करती है, नए संबंध बनाती है, माँ बनती है, सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करती है और अंततः ऐसी त्रासदी का सामना करती है जो उसके पूरे जीवन की दिशा बदल देती है। लेखक ने उसके व्यक्तित्व को किसी एक पहचान में सीमित नहीं किया। वह एक साथ बेटी, प्रेमिका, पत्नी, माँ, मंत्री और न्याय की तलाश में भटकती आम नागरिक है।

उपन्यास का आरंभिक हिस्सा प्रेम और पारिवारिक जीवन का है। माधवी और श्रीनिवासन का संबंध इस अर्थ में उल्लेखनीय है कि वह जाति और धार्मिक पूर्वाग्रहों के विरुद्ध किसी वैचारिक घोषणा की तरह नहीं, बल्कि सहज मानवीय निर्णय के रूप में सामने आता है। विवाह के बाद दोनों का जीवन भारतीय मध्यवर्गीय परिवारों की आकांक्षाओं, संघर्षों और छोटे-छोटे सुखों से निर्मित होता है। लेखक इन प्रसंगों में अनावश्यक नाटकीयता से बचते हैं और यही संयम उन्हें विश्वसनीय बनाता है।

उपन्यास का सबसे संवेदनशील पक्ष उनकी गूँगी-बहरी बेटी का चरित्र है। हिंदी कथा साहित्य में दिव्यांग पात्र प्रायः करुणा उत्पन्न करने के लिए प्रयुक्त होते रहे हैं, लेकिन यहाँ लेखक उसे दया का पात्र नहीं बनाते। परिवार उसे समान अवसर देता है, उसकी प्रतिभा पर विश्वास करता है और वह अपनी मेहनत से राष्ट्रीय स्तर की शतरंज खिलाड़ी बनती है। यह प्रसंग उपन्यास के सबसे सकारात्मक बिंदुओं में से एक है। लेखक बिना भाषण दिए समावेशी समाज की आवश्यकता का संकेत कर देते हैं।

लेखक दीपक गिरकर राजनीति को भी एक अलग दृष्टि से देखते हैं। माधवी का शिक्षा मंत्री बनना सत्ता प्राप्ति का प्रसंग नहीं, वरन सामाजिक जिम्मेदारी का विस्तार है। सरकारी विद्यालयों की स्थिति सुधारने और बाल श्रम के विरुद्ध उसका अभियान बताता है कि लेखक राजनीति में नैतिक संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं करते। साथ ही सत्ता परिवर्तन के बाद वही राजनीति किस तरह व्यक्ति को अकेला छोड़ देती है, इसका चित्रण भी वे समान ईमानदारी से करते हैं। यहाँ उपन्यास किसी दल विशेष की आलोचना नहीं करता, बल्कि सत्ता के स्वभाव को समझने का प्रयास करता है।

उपन्यास का सबसे प्रभावशाली हिस्सा उसका अंतिम खंड है। बेटी की हत्या के बाद कथा निजी दुख से निकलकर न्याय व्यवस्था की विडंबनाओं तक पहुँचती है। अदालतों की लंबी प्रक्रिया, तारीख़ों का अंतहीन सिलसिला, प्रभावशाली लोगों की पहुँच और पीड़ित परिवार की असहायता का चित्रण लेखक ने अनुभवजन्य विश्वसनीयता के साथ किया है। उल्लेखनीय यह है कि वे व्यवस्था के प्रति आक्रोश व्यक्त करते हुए भी उसे एकांगी नहीं बनाते। उपन्यास का सबसे कठिन प्रश्न यही है क्या न्याय में असहनीय विलंब पीड़ित को व्यवस्था पर से विश्वास खोने के लिए विवश कर देता है?

माधवी द्वारा कानून अपने हाथ में लेना उपन्यास का सबसे विवादास्पद प्रसंग है। लेखक इसका महिमामंडन नहीं करते। वे इसे प्रतिशोध की विजय नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की विफलता से उत्पन्न त्रासदी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यही कारण है कि उपन्यास किसी आसान निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता। पाठक के सामने कई प्रश्न छोड़ देता है, जिनका उत्तर साहित्य नहीं, समाज और व्यवस्था को देना है।

शिल्प की दृष्टि से उपन्यास सीधी, आत्मकथात्मक और संवादप्रधान शैली में लिखा गया है। भाषा सहज है और लेखक पाठक पर अपने विचार आरोपित नहीं करते। कहीं-कहीं स्मृतियों का विस्तार कथा की गति को धीमा अवश्य करता है, पर वही विस्तार पात्रों की मनःस्थिति को भी विश्वसनीय बनाता है।

दीपक गिरकर भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्‍त हुए हैं और लंबे समय से कहानी, व्यंग्य, आलोचना और उपन्यास लिखते आए हैं। उनका यह उपन्यास उनके पूर्व लेखन की स्वाभाविक निरंतरता भी है। बैंकिंग सेवा के लंबे अनुभव और कथा-साहित्य में सक्रिय उपस्थिति ने उन्हें जीवन के अनेक स्तरों को निकट से देखने का अवसर दिया है। ‘अम्मा’ और ‘एक बैंक मैनेजर की डायरी’ के बाद स्टेलमेट उनके कथा-संसार में एक नया आयाम जोड़ता है। 

‘स्टेलमेट’ पढ़ते हुए यही अनुभव बचता है कि यह किसी अपराध या मुकदमे का उपन्यास नहीं है। यह उस स्त्री की कथा है जो जीवन के लगभग हर रूप प्रेम, परिवार, मातृत्व, सत्ता, शोक और न्याय से होकर गुजरती है और फिर भी मनुष्य बने रहने का प्रयास करती है। यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि है। यह पाठक को केवल एक कहानी नहीं सुनाता, बल्कि यह सोचने के लिए विवश करता है कि किसी भी सभ्य समाज की असली कसौटी उसकी अदालतें नहीं, बल्कि यह है कि वह अपने सबसे पीड़ित नागरिक के साथ कैसा व्यवहार करता है।

उपन्यास – स्टेलमेट

लेखक – दीपक गिरकर

प्रकाशक – न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, नईदिल्‍ली

मूल्य – रु 299/-

कुमार सिद्धार्थ