
पुस्तक: रिश्तों की डोर तथा अन्य कहानियां
समीक्षक: शिव मोहन यादव
लेखिका: विद्या श्रीवास्तव
प्रकाशन: राज पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली
मूल्य: 300 रुपये
कहानी का इतिहास सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं के बीच एक सतत संवाद रहा है, जिसकी शुरुआत माधव राव सप्रे की ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ जैसी कहानियों से होती है, जो नैतिक पक्षधरता और विधवा-जमींदार संघर्ष को उजागर करती हैं, और इस परंपरा को प्रेमचंद ने और गहराई दी, जिनकी ‘बूढ़ी काकी’ जैसी कहानियाँ बुजुर्गों के प्रति अन्याय और कर्म-धर्म के प्रश्न उठाती हैं, जहाँ पाप का भय ही नायिका को उसके अपराध का एहसास दिलाता है। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में नई कहानी आंदोलन ने अस्तित्ववादी चिंताओं, आंतरिक संघर्ष और मध्यवर्गीय अकेलेपन को विषय बनाया, जहाँ निर्मल वर्मा ने मनोवैज्ञानिक बनावट को तो अमरकांत ने ग्रामीण-मध्यवर्गीय संघर्षों को आशा के साथ चित्रित किया। 1960-70 के दशक तक कहानी ने नारी-विमर्श, दलित-जीवन और पर्यावरण जैसे नए सरोकारों को स्थान दिया गया। इसी सांस्कृतिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में विद्या श्रीवास्तव का संग्रह ‘रिश्तों की डोर’ आता है, जो पारंपरिक कथा-सौंदर्य को बनाए रखते हुए समकालीन संवेदनाओं को संजोता है, और जिसका केंद्र हिंदी कहानी का मूल तत्व ‘रिश्ते’ है, जिसे उसने भावनाओं, त्याग और विश्वास की डोर से परिभाषित किया है, और समय की आंधियों में कमजोर पड़ती यह डोर ही उसके कथा-संसार का केंद्रीय तनाव है, जो प्रेमचंद की सामाजिक चिंता और नयी कहानी के आंतरिक द्वंद्व के बीच एक सेतु का काम करती है, क्योंकि सागर और शालिनी की कहानी इस संघर्ष को आधुनिक संदर्भ में रखती है, जहाँ सपने और कर्तव्य के बीच उलझे रिश्ते कहानी को वास्तविक और मार्मिक बनाते हैं। इस संग्रह की तेरह कहानियाँ जीवन की विविध छवियाँ प्रस्तुत करती हैं – ‘रिश्तों की डोर’ अपेक्षाओं और सहारे के बीच उलझे प्रेम की व्यथा दिखाती है, हालांकि ओमप्रकाश के मन की पीड़ा और उसका दर्द हरिशंकर की बातें सुनकर समाप्त हो जाता है। ‘सुबह का भूला … शाम को’ कहानी क्षमा और समय की क्रूर विडंबना को दर्शाती है, पर अंततः सरिता के आत्मग्लानि और लज्जा भाव से स्पष्ट होता है कि लौट के बुद्धू घर को आ गए। ’मेरे साथ धोखा हुआ’ विश्वासघात और स्त्री-मन की पीड़ा को उजागर करती है। कहानी की संपूर्ण पीड़ा तब समाप्त होती है, जब स्पष्ट हो जाता है कि दहेज के कारण यह शादी नहीं टूटेगी।
‘रिश्तों की डोर’ विद्या श्रीवास्तव जी की तेरह कहानियों से सजा विविध रंगों का गुलदस्ता है। लेखिका के एक दर्जन कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उन्होंने पुस्तक संपादन कार्य भी किया है। इस कहानी संग्रह में उन्होंने अलग अलग ढंग की कहानियों को सम्मिलित किया है। उनकी लेखनी में रिश्तों की बुनावट और उनकी संवेदनशीलता की समझ समाहित है।
’पंडित राजा राम’ पंडित भोलानाथ और पंडिताइन की कहानी है। अंततः पंडित राजाराम जी को महंत बनाया जाता है, इसकी घोषणा कमेटी के अध्यक्ष जी करते हैं। कुल मिलाकर एक उम्दा कहानी। ‘बुद्ध, बना बुद्धिराम’ ज्ञान की पोथी और जीवन के बोध का अंतर दिखाती है, पुरानी रीति-रिवाज को भी दर्शाती है। ‘सोचने को बहुत कुछ’ में मिस सेवी का उम्दा चित्रण है। वे अमेरिका में अनाथ बेसहारा बच्चों के लिए संस्था चलाती हैं, और उनका मन हुआ कि वे अपने देश में काम करेंगीं। ऐसे अनेक अनाथ बच्चों के लिए भारत में संस्था का संचालन करेंगीं। ऐसी ही मानसिक उथल-पुथल का रेखाचित्र है इस कहानी में। ‘माँ, मैं जीना चाहती हूँ!’ सुखिया के जीवन पर आधारित है। उसके जीवन-संघर्ष में स्त्री की पुकार है। ‘पाप-मुक्ति गिल्ट और कर्म-सिद्धांत का प्रश्न उठाती है। ‘हम सब स्वागत करेंगे’ मानवीय करुणा और समावेशी भावना की बात करती है। यह राधिका, पिंकी, रमा और उमा आदि पात्रों पर आधारित है। ‘परी का नाच’ जगनपुर के संतू और हामिद की कहानी है। इसमें बाल कहानी के सभी तत्व दिखते हैं। ‘अपना प्यारा-सा गाँव’ ग्रामीण जीवन की सुंदरता और सामूहिकता को समेटे हुए है, यहां बिरजू और उसके आसपास के ग्राम्य परिवेश को दिखाया गया है। ‘समय बड़ा बलवान’ समय के सामने सबकी क्षणभंगुरता को दिखाती है और स्पष्ट करती है कि समय के साथ सब ठीक हो जाता है। ‘अतीत की यादें’ स्मृतियों के बोझ और वर्तमान से सामंजस्य का रूप है, और बाल कहानी प्रतीत होती है। इस प्रकार श्रीवास्तव का यह संग्रह भारतीय कथा-शिल्प की सहजता और संवेदनशीलता को समेटे हुए है, जो पाठक को गहराई से जोड़ता है।
कहानी संग्रह की भाषा सरल और रोचक है। इसकी शैली प्रवाहमय और पाठकों को बांधे रखने में सक्षम है। कुल मिलाकर एक उपयोगी और पठनीय कहानी का गुलदस्ता है।
– शिव मोहन यादव, (लेखक, बाल-साहित्यकार)
सहायक संपादक, प्रकाशन प्रभाग, एनसीईआरटी
मो. – 9616926050

