कहानी: कर्तव्य का हाथ

साहित्य

माता-पिता की आँखों का तारा, रमेश, बचपन में बहुत चंचल और नटखट था। गाँव की गलियों में उसकी हँसी और चहल-पहल से हर घर गूंज उठता था। लेकिन किसे पता था कि एक पल की लापरवाही उसकी पूरी ज़िंदगी बदल देगी। एक दिन दोस्तों के साथ गेंद से खेलते-खेलते रमेश अचानक ध्यान खो बैठा और भागते हुए मुख्य सड़क पर चला गया। उसी क्षण मोड़ से एक तेज़ रफ़्तार गाड़ी आई और भीषण टक्कर के साथ रमेश सड़क किनारे गिर पड़ा।

चीख-पुकार सुनकर गाँव वाले और माता-पिता दौड़ पड़े। रमेश खून से लथपथ था। उसे तुरंत शहर के बड़े अस्पताल ले जाया गया। कई घंटों के ऑपरेशन के बाद डॉक्टर जब बाहर आए, तो उनके चेहरे पर उदासी थी। उन्होंने भारी मन से कहा, “बच्चे की जान तो बच गई है, लेकिन टक्कर में उसका दायाँ हाथ पूरी तरह कुचल चुका था। उसे काटना पड़ा, अब वह हाथ वापस नहीं जुड़ सकता।”

यह खबर रमेश के परिवार पर पहाड़ बनकर टूटी। लोग तरह-तरह की बातें करने लगे—”अब इस बच्चे का क्या होगा?”, “यह बड़ा होकर क्या करेगा?” लेकिन रमेश ने धीरे-धीरे अपनी इस शारीरिक कमी को स्वीकार कर लिया। उसने कभी अपनी किस्मत को नहीं कोसा और न ही खुद को बेबस माना।

उम्र बीतने के साथ रमेश बड़ा हुआ। गाँव में सीमित अवसर थे, इसलिए उसने शहर जाकर आत्म-निर्भर बनने का फैसला किया। शहर पहुँचकर उसने देखा कि लोग भागदौड़ भरी ज़िंदगी में अपने घरों के छोटे-छोटे बगीचों की देखरेख नहीं कर पाते। रमेश को बचपन से ही पेड़-पौधों, मिट्टी की सोंधी महक और रंग-बिरंगे फूलों से गहरा लगाव था। उसने तय किया कि वह बागवानी का काम करेगा।

शुरू-शुरू में लोगों को संशय था कि एक हाथ वाला व्यक्ति कुदाल कैसे चलाएगा, पौधों की कटाई-छंटाई और सिंचाई कैसे करेगा। लेकिन रमेश ने अपने एक ही हाथ से इतनी कुशलता और लगन से काम करना शुरू किया कि देखने वाले हैरान रह गए। वह एक हाथ से औज़ार इस तरह संभालता मानो उसे किसी दूसरे हाथ की आवश्यकता ही न हो। उसकी लगन और ईमानदारी की चर्चा पूरे शहर में होने लगी। जल्द ही, नगर निगम ने उसकी प्रतिभा को पहचानते हुए उसे शहर के सबसे बड़े और प्रमुख नगर-उद्यान (गार्डन) का मुख्य माली बना दिया। Ramesh ने उस सूखे और उपेक्षित पड़े बगीचे को अपनी मेहनत से स्वर्ग जैसा सुंदर बना दिया।

उसी नगर-उद्यान के मुख्य संरक्षक एक बेहद सुलझे और सहदय व्यक्ति थे। वे अक्सर शाम को गार्डन का मुआयना करने आते और रमेश को बिना थके, कड़ाके की धूप हो या ठंड, पूरी तन्मयता से काम करते देखते। एक दिन वे रमेश के पास गए और स्नेह से उसके कंधे पर हाथ रखकर बोले, “रमेश, तुम्हारी मेहनत का तो कोई जवाब नहीं है, लेकिन तुम अपनी सेहत का ध्यान कैसे रखते हो? यहाँ शहर में अकेले रहते हो, तुम्हारे खाने-पीने का प्रबंधन कैसे होता है?”

रमेश ने सादगी से मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, “साहब, सुबह काम पर आने से पहले खुद ही कुछ चाय-नाश्ता बना लेता हूँ। दोपहर में काम में समय का पता ही नहीं चलता और शाम को कमरे पर लौटकर जैसा-तैसे एक-दो रोटी बनाकर गुज़ारा कर लेता हूँ।”

रमेश की यह सादगी और संघर्ष देखकर संरक्षक का हृदय पसीज गया। उन्होंने तुरंत कहा, “नहीं रमेश, आज से तुम शाम का भोजन हमारे घर पर ही करोगे। मेरी पत्नी तुम्हारे लिए रोज़ खाना बनाएगी।”

संरक्षक की पत्नी भी अत्यंत दयालु और ममतामयी स्त्री थीं। वे रमेश को केवल एक माली नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य की तरह मानती थीं। शाम को जब रमेश उनके घर पहुँचता, तो वे उसे बड़े प्रेम-भाव से गरमा-गरम और स्वादिष्ट भोजन परोसतीं। रमेश के मन में भी उनके प्रति अगाध सम्मान था। वह जब भी समय पाता, नि:स्वार्थ भाव से उनके घर के निजी बगीचे के सुंदर-सुंदर फूलों और पौधों की देखरेख कर देता।

समय बीतता गया। एक दिन रमेश चेहरे पर अद्भुत प्रसन्नता और हाथ में मिठाई का डिब्बा लिए संरक्षक के घर आया। उसने आते ही कहा, “भाभी जी! जल्दी से मुँह मीठा कीजिए, आज मेरे लिए बहुत बड़ा और खुशी का दिन है!”

भाभी जी ने मुस्कुराते हुए मिठाई का टुकड़ा लिया और उत्सुकता से पूछा, “अरे वाह रमेश! आज बहुत खुश दिखाई दे रहे हो, क्या बात है? कोई लॉटरी लगी है क्या?”

रमेश ने गद्गद होकर कहा, “भाभी जी, लॉटरी से भी बड़ी खुशी की बात है! गाँव से खबर आई है कि मेरे छोटे भाई के घर जुड़वाँ बच्चों ने जन्म लिया है। भगवान ने एक साथ दो-दो नन्हीं खुशियाँ दी हैं। बस उसी की खुशी में मैं पूरे शहर में मिठाई बाँट रहा हूँ।”

भाभी जी ने उसे ढेर सारी बधाई दी और कहा, “यह तो सचमुच बहुत शुभ समाचार है!” फिर बातों ही बातों में, रमेश का ध्यान उसके अपने जीवन की ओर खींचते हुए भाभी जी ने ममता भरे स्वर में कहा, “अरे रमेश, अब तो छोटा भाई भी पिता बन गया, घर में खुशियाँ आ गई हैं। अब तुम अपने बारे में कब सोचोगे? तुम भी अपना घर बसा लो, शादी कर लो। आखिर कब तक अकेले ज़िंदगी काटोगे?”

रमेश का चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया। उसने सिर झुकाकर धीमी और संकोची आवाज़ में कहा, “नहीं भाभी जी… मैं शादी नहीं कर सकता। मुझ जैसे एक हाथ वाले व्यक्ति से कौन शादी करेगा और मैं किसी पर बोझ भी नहीं बनना चाहता।”

भाभी जी ने उसे बीच में ही टोकते हुए बड़े प्यार से समझाया, “तुम ऐसा क्यों सोचते हो रमेश? जब इस दुनिया में गूंगे और बहरे लोग भी अपना घर बसाते हैं और सुखी जीवन जीते हैं, तो तुम क्यों नहीं? तुम तो दो हाथ से काम करने वाले सामान्य लोगों से भी ज्यादा मेहनत करते हो। तुम्हारी लगन, ईमानदारी और सादगी देखकर कोई भी लड़की तुमसे शादी करने को सहर्ष तैयार हो जाएगी। तुम्हें खुद को कमतर नहीं समझना चाहिए।”

यह सुनकर रमेश ने एक गहरी सांस ली। उसने अपनी आँखें उठाईं, जिनमें अब संकोच की जगह एक अटूट संकल्प और चमक थी। वह बोला, “भाभी जी, आप बिल्कुल सही कह रही हैं। लेकिन सच तो यह है कि अब मेरा उद्देश्य खुद का परिवार बसाना या अपने लिए सुख-सुविधाएँ जुटाना है ही नहीं।”

भाभी जी आश्चर्य से उसे देखने लगीं। रमेश ने आगे कहा, “ईश्वर ने मेरा एक हाथ लेकर शायद मुझे यह सिखाया कि जीवन सिर्फ अपने लिए जीने के लिए नहीं होता। जो दो मासूम बच्चे मेरे भाई के घर आए हैं, मैं उन्हें ही अपना सब कुछ मानता हूँ। मैं अपनी कमाई का एक-एक पैसा उनकी परवरिश में लगाऊँगा। उन्हें शहर के सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ाऊँगा, उन्हें अच्छी शिक्षा और संस्कार दूंगा ताकि वे बड़े होकर एक महान और अच्छे इंसान बन सकें। उन बच्चों का भविष्य संवारना ही अब मेरे जीवन का एकमात्र लक्ष्य है। मुझे अपने लिए किसी नए परिवार की आवश्यकता नहीं है।”

रमेश के इन शब्दों में छिपा त्याग, निःस्वार्थ प्रेम और कर्तव्यबोध देखकर भाभी जी स्तब्ध रह गईं। उनका गला भर आया। उन्होंने महसूस किया कि शरीर से एक हाथ न होने के बावजूद, रमेश का दिल दो हाथ वाले कई लोगों से कहीं अधिक विशाल और समर्थ था। उन्होंने रमेश के सिर पर हाथ रखा और उसके ऊँचे विचारों और महान त्याग की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

रमेश उस दिन अपनी ज़िंदगी के असली मकसद को पाकर एक नए आत्मविश्वास के साथ मुस्कुरा रहा था।

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