शहनाई के जादूगर, भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान

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भारत के दो महापुरुष ऐसे थे जिनको भारतीय संस्कृति, यहां की मिट्टी, नदियों और कश्मीर से कन्याकुमारी तक सभी लोगों से अथाह प्रेम था। ये दोनों ही महानुभव धर्म से तो मुस्लिम थे लेकिन इनमें सभी धर्मों के भारतीयों से सीमाहीन लगाव था। एक थे शहनाई के जादूगर उस्ताद बिस्मिल्लाह खान और दूसरे थे मिसाइल मैन, पुर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम। चुंकि आज महान शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की पुण्यतिथि है, इसलिए आज हम उन्हीं के विषय में चंद बातें करेंगे और उनको स्मरण करेंगे। बिस्मिल्लाह खान का जन्म 21 मार्च 1916 को बिहार के डुमरांव नामक शहर में हुआ था। बचपन में उनका नाम कमरुद्दीन था लेकिन वे बिस्मिल्लाह खान के नाम से ही विश्व विख्यात हुए थे। छह साल की उम्र में वे काशी आ गए थे जहां उनके मामा अलि बख्श विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाते थे। बाद में बिस्मिल्लाह खान भी विश्वनाथ मंदिर के नियमित शहनाई वादक हो गए थे। एक बार काशी, अर्थात बनारस आने के बाद बिस्मिल्लाह साहब को यहां के पवित्र मंदिरों और गंगा नदी और इसके घाटों से चिरंतन जुड़ाव हो गया था। बनारस के मंदिरों और गंगा नदी के प्रेम बंधन में बंध कर ही वे शहनाई वादन की चोटी तक पहुंच गए थे। गंगा घाट पर बैठ कर तन्मयता के साथ घंटों शहनाई का रिवाज करना उनका प्रमुख दिनचर्या बन गया था। एक बार उन्होंने अमेरिका में बसने का लुभावना निमंत्रण ये कह कर ठूकरा दिया था कि वहां मुझे गंगा नदी या बनारस के मंदिर कुछ भी नहीं मिल सकता है।  2001 में भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘भारत रत्न’ से सम्मानित उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का निधन 21 अगस्त 2006 में हुआ था।

   अनित कुमार राय टिंकू, बाघमारा, धनबाद।