भारत पर लगाने चला 100 प्रतिशत टैरिफ
वॉशिंगटन । अमेरिका ने एक ऐसी नीति अपनाई है जिसमें वह रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर कड़ा रुख अपना रहा है, जबकि अपनी रणनीतिक जरूरतों के लिए खुद को छूट दे रहा है। हाल ही में अमेरिकी कांग्रेस ने एक विधेयक पारित किया है जिसके तहत रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले या उसे प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले देशों के सामान पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकेगा। इस विधेयक को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 262-159 वोटों से और सीनेट ने पहले ही 86-11 वोटों से मंजूरी दे दी थी। अब यह कानून बनने के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास है।
इस कानून का सीधा असर भारत और चीन जैसे उन बड़े ऊर्जा खरीदारों पर पड़ सकता है, जो रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस का आयात करते हैं। अमेरिका का तर्क है कि रूस से तेल और गैस की कमाई मॉस्को को युद्ध जारी रखने की क्षमता देती है, इसलिए उसके खरीदारों पर दबाव बनाना जरूरी है। लेकिन जब बात अमेरिका के अपने हितों की आई तो नियमों में ढील देखने को मिली। उसी विधेयक में रूस से जुड़े कुछ परमाणु सहयोग और कम एनरिच्ड यूरेनियम के आयात को अपवाद दिया गया है। विधेयक में रूस की परमाणु कंपनी रोसाटोम और उसकी सहायक कंपनियों का जिक्र है, लेकिन अमेरिकी-रूसी सिविल न्यूक्लियर सहयोग समझौतों के तहत कुछ गतिविधियों को प्रतिबंधों से बाहर रखा गया है। कम एनरिच्ड यूरेनियम के आयात के लिए भी मौजूदा कानूनों के तहत अपवाद मौजूद हैं।
इसका मतलब साफ है कि अमेरिका एक तरफ रूस से ऊर्जा खरीदने पर दूसरे देशों के खिलाफ सख्त टैरिफ लगाने की तैयारी कर रहा है, लेकिन दूसरी तरफ जब उसकी अपनी परमाणु ऊर्जा उद्योग की जरूरतों की बात आई तो उसने रूस के साथ परमाणु कारोबार पर पूरी तरह से दरवाजा बंद नहीं किया है, बल्कि नियमों में छूट का रास्ता बचाए रखा है। यह अमेरिका की दोहरी नीति को दर्शाता है, जहां भारत जैसे देशों के लिए रूस से तेल खरीदने पर टैरिफ की तलवार लटक रही है, वहीं अमेरिका अपनी परमाणु जरूरतों के लिए रूस पर निर्भरता बनाए रखने हेतु नियमों में बदलाव कर रहा है।

