गिर के बाद अब बरडा बना एशियाई शेरों का नया घर!

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144 साल बाद बरडा के जंगल में शेरों की प्राकृतिक वापसी, वैज्ञानिक अध्ययन ने दी दीर्घकालिक संरक्षण की उम्मीद

  • 17 शेरों के लिए अनुकूल आवास, पर्याप्त शिकार और सुरक्षित पर्यावरण की पुष्टि
    अहमदाबाद | एशियाई शेर विश्व में केवल गिर के जंगल में ही पाए जाते हैं। हालाँकि, शेर अपने परंपरागत क्षेत्र से बाहर भी विस्तार कर रहे हैं। ऐसे समय में, बरडा का जंगल एशियाई शेरों के लिए एक नया ‘घर’ बना है। पोरबंदर तथा देवभूमि द्वारका जिलों में फैले बरडा के जंगल की चट्टानी पहाड़ियाँ शेरों को रास आ गई हैं। हाल ही में किए गए एक अध्ययन के अनुसार, बरडा वन्यजीव अभयारण्य शेरों के दीर्घकालिक महत्वपूर्ण आश्रयस्थल के रूप में विकसित हो सकता है।
    सौराष्ट्र में स्थित बरडा वन्यजीव अभयारण्य 192.31 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है और इसका बड़ा हिस्सा पोरबंदर तथा देवभूमि द्वारका जिले में स्थित है। यह अभयारण्य वनस्पतियों की असाधारण विविधता से समृद्ध है और यहाँ कई प्रकार की औषधीय वनस्पतियाँ पाई जाती हैं, जिनमें पर्यावरणीय एवं संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रजातियाँ भी शामिल हैं।
    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश ने वन्यजीवों के संरक्षण एवं सुरक्षा के प्रयासों को और गति दी है।
    मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में गिर के शेरों के संरक्षण के लिए अनेक कदम उठाए जा रहे हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री द्वारा बरडा के जंगल में रहने वाले पशुपालकों के लिए एक पुनर्वास योजना घोषित की गई है और बरडा का जंगल शेरों के लिए एक सुरक्षित नया घर बना है। हाल ही में किए गए अध्ययन के अनुसार, बरडा के जंगल में शेरों को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए आवश्यक आवास, पर्याप्त शिकार और अनुकूल पर्यावरणीय परिस्थितियाँ उपलब्ध हैं।
    “गिर से परे: बरडा वन्यजीव अभ्यारण्य एशियाई शेरों के लिए एक संभावित गढ़ के रूप में” शीर्षक वाला यह अध्ययन पीएलओएस वन में प्रकाशित हुआ है। गुजरात वन विभाग के मोहन राम (आईएफएस), आराधना साहू (आईएफएस), नित्यानंद श्रीवास्तव (आईएफएस), रोहित चौधरी, लहर झाला और यशपाल झाला तथा बांदा यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी के शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया था।
    इस अध्ययन में लगभग 144 वर्षों के अंतराल के बाद बरडा के जंगल में फिर से लौटे शेरों के क्षेत्र के उपयोग, आवास के चयन एवं आहार का अध्ययन किया गया।
  • 144 वर्षों के बाद शेरों ने प्राकृतिक रूप से बरडा को फिर से बनाया ठिकाना
    लगभग 144 वर्षों के बाद शेरों ने प्राकृतिक रूप से बरडा में फिर से अपना ठिकाना बनाया। शुरुआत में एक नर शेर यहाँ आया था और उसके बाद गुजरात वन विभाग द्वारा पाँच मादा शेरों को यहाँ लाया गया।
    वन एवं पर्यावरण मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने कहा, “एशियाई शेरों के संरक्षण की दृष्टि से यह अत्यंत महत्वपूर्ण शोध है। अब शेरों की आबादी केवल गिर के जंगल तक सीमित नहीं रही है। गिर के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र से बिखरकर आने वाले शेरों के लिए बरडा का जंगल दूसरा घर बना है। इस वैज्ञानिक अध्ययन के निष्कर्ष इसी का परिणाम हैं।”
    अर्जुन मोढवाडिया ने आगे कहा, “मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के मार्गदर्शन में राज्य सरकार गुजरात में एशियाई शेरों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है और शेरों के दीर्घकालिक अस्तित्व के लिए आवश्यक सभी कदम उठाए जा रहे हैं।”
    वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री प्रवीण माळी ने कहा, “फ्रंटलाइन स्टाफ के रिक्त पदों को प्राथमिकता के आधार पर भरा गया है। शेरों की गतिविधियों और स्वास्थ्य पर दैनिक निगरानी रखने के लिए आठ पूर्णकालिक शेर ट्रैकर तैनात किए गए हैं। मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति से निपटने के लिए त्वरित प्रतिक्रिया व्यवस्था को भी और मजबूत बनाया गया है।”
  • बरडा के जंगल में शेरों की ‘घर वापसी’
    जूनागढ वन वृत्त के वन संरक्षक और अध्ययन के एक लेखक मोहन राम (आईएफएस) ने कहा, “बरडा वन्यजीव अभयारण्य में वर्तमान में 17 शेर हैं। शोध के लिए छह शेरों – एक नर और पाँच मादाओं – को रेडियो-कॉलर लगाया गया था। जनवरी 2023 से जुलाई 2025 के दौरान उनके 1.69 लाख से अधिक जीपीएस लोकेशन प्राप्त किए गए। निष्कर्ष बताते हैं कि शेर बरडा के जंगलों में घास के मैदानों का सक्रिय रूप से उपयोग करते हैं। शेर अपनी होम रेंज स्थापित कर रहे हैं और सामाजिक संबंध विकसित कर रहे हैं।”
  • बरडा में शेरों के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए योजना
    अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) डॉ. जयपाल सिंह ने कहा, “वन विभाग शेरों के लिए प्रे बेस (शिकार के आधार) को तैयार करने पर ध्यान केन्द्रित कर रहा है। वर्ष 2025–26 के दौरान गिर वन्यजीव अभयारण्य से 441 चीतल को बरडा के जंगल में छोड़ा गया था।”
    वर्ष 2007 से लेकर अब तक बड़ी संख्या में चीतल को बरडा के जंगल में छोड़ा गया है। इसके अलावा, सांभर का भी संवर्धन करके उन्हें जंगल में छोड़ा जाता है।
  • बरडा इको-टूरिज्म से स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर
    बरडा वन्यजीव अभयारण्य में इको-टूरिज्म की पहल के माध्यम से स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं। जूनागढ (वन्यजीव) वृत्त के वन संरक्षक डॉ. राम रतन नाला (आईएफएस) ने कहा, “हमने वर्ष 2024 में बरडा अभयारण्य में इको-टूरिज्म शुरू किया था, जिसके परिणामस्वरूप स्थानीय निवासियों के लिए नेचर गाइड और सफारी ऑपरेटर के रूप में अवसर पैदा हुए हैं।”
    इस पहल के चलते पर्यटकों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। बरडा वन्यजीव अभयारण्य में पहले वर्ष 2,271 पर्यटक आए थे, जबकि 2025–26 में यह संख्या बढ़कर 3,359 हो गई, जो 48 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्शाती है।